अवधूत बाबा गौरी शंकर के किस्से - 1 ramgopal bhavuk द्वारा आध्यात्मिक कथा में हिंदी पीडीएफ

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अवधूत बाबा गौरी शंकर के किस्से - 1

अवधूत बाबा गौरी शंकर के किस्से 1

रामगोपाल भावुक

सम्पर्क- कमलेश्वर कोलोनी (डबरा) भवभूतिनगर

जि0 ग्वालियर ;म0 प्र0 475110

मो0 9425715707, , 8770554097

ई. मेल. tiwariramgopal5@gmail.com

मेरे परम आराध्य

परमहंस मस्तराम गैारीशंकर बाबा के श्री चरणों में

सादर समर्पित

रामगोपाल भावुक

2.6.20

भूमिका

मैं परमश्रद्धेय गुरूदेव स्वामी हरिओम तीर्थ जी के पास एक दो दिन में गुरूनिकेतन जाता रहता हूँ। यह गुरूनिकेतन स्वामी नारायण देव तीर्थजी महाराज की परम्परा का है। उस दिन जब मैं गुरूनिकेतन पहुँचा , नगर के प्रसिद्ध होमोपैथी चिकित्सक डा0 के0 के0 शार्मा वहाँ पहले से ही मौजूद थे। जैसे ही मैं उनके पास बैठा महाराज जी बोले-‘‘‘और तिवाड़ी जी क्या कर रहे हैं?’’

मैंने कहा-‘‘इन दिनों मैं अवधूत बाबा गौरी शंकर का जीवनचरित्र पुनः लिखने की सोच रहा हूँ। हमारे परमहंस मस्तराम गैारीशंकर सत्संग समिति के सदस्य इस बात पर जोर दे रहे हैं।

महाराज जी ने पूछा-‘‘ समिति में कौन-कौन हैं?’’

मैंने नाम गिनाये-‘‘अनन्तराम गुप्त,रामवली सिंह चन्देल,भवानीशंकर सैन,इ0जगदीश तिवारी एवं प्रेम नारायण विलैया आदि आते हैं।

वे बोले-‘‘बस चार पाँच लोग !’’

मैंने कहा-‘‘जी, बाबा की जिस पर कृपा है वही सत्संग में टिक पाता हैं। मैंने देखा है सत्संग में कुछ लोग बड़े उत्साह से आ तो जाते हैं किन्तु उनका आना एक दो वार से अधिक नहीं हो पाता। फिर उनका इधर आने का मन ही नहीं होता।’’

महाराज जी बोले-‘‘बाबा की इच्छा के बिना कुछ भी सम्भव नहीं है। इस तरह की जो प्रेरणा हो रही है वह उनकी ही कृपा से ही, फिर इस काम में देर न करें। लिखना शुरूकर दीजिये।’’

मैंने पूछा-‘‘कैसे?’’

महाराज जी बोले-‘‘अबकी वार इसे पहले की तरह नहीं लिखे,, अब तो उपन्यास की शैली में उनका सम्पूर्ण जीवन वृत लिखिये।’’

यह कहकर गुरूदेव स्वामी हरिओम तीर्थ जी महाराज बाबा की कथा सुनाने लगे- मुझे याद है जब मैं शुरू- शुरू में इस नगर में आया था , बाबा उन दिनों तहसील प्रगंण डबरा में तहसीलदार रायजादा के न्यायालय के समक्ष बाहर वरामदे में बैठे रहते थे’। मैं उनके सामने से जितनी वार गुजरता उतनी ही वार उन्हें प्रणाम करके निकलता था। वे बैठे-बैठे मस्ती में झूमते रहते थे। एक दिन मैं उनके लिये फल ले आया तो उन्होंने सहजता से ग्रहण कर लिये। जब यह दृश्य तहसीलदार रायजादा ने देखा तो मुझ से बोले-‘‘बाबा तो किसी से कोई चीज ग्रहण ही नहीं करते किन्तु आश्चर्य आपसे फल ग्रहण कर लिये। आप तो बड़े भाग्य वाले हैं। मैंने रायजादा जी से कहा-‘‘ यह उनकी कृपा है।’’ मुझ पर तो महान संन्तों की कृपा जीवन भर होती रही है।’’

महाराज जी की बात सुनकर डा0 के0 के0 शार्मा बोले-‘‘संत हरपल अपने इष्ट की उपासना में लीन रहते हैं। उनमें अपने पराये का भाव नहीं होता। संत के हृदय में तो समत्व का भाव रहता है। ऐसे संतों का सानिध्य पाकर व्यक्ति कृतार्थ हो जाता है। सुना है गौरी बाबा ऐसे ही संत रहे हैं। स्वामी जी जैसे कह रहे हैं ,उसी तरह से आपको बाबा का चरित्र लिखना शुरू कर देना चाहिये।’’ इस बात को गुनते हुये मैं घर लौट आया और उसी दिन इसका लेखन शुरू कर दिया।

आस्था के चरण

आस्थाओं- अनास्थाओं का द्वंद बचपन से ही चलना शुरू हो गया था। कभी आस्थायें जीती हैं तो कभी अनास्थायें । फिर भी द्वंद बन्द नहीं हुँआ है। साधु- सन्तों से कुछ पाने की इच्छा रही हैं जिससे आस्थायें जीत सकें।

मैं अपनी उस भ्रमात्मक वुद्धि का स्वागत करता हूँ जो आस्थाओं का मोह लेकर सत्य की तलाश में भटकती रही।

जन चर्चाओं में मस्तराम बाबा के बारे में कुछ बातें सुन पड़ी। मन दर्शन करने को व्याकुल हो उठा।

उन दिनों बाबा डबरा शहर में भेंसावाले तिवारी के मकान पर ठहरे हुये थे। सांझ का समय,अंधेरा सा होने लगा था। जब मैं उनके यहाँ पहुँचा मस्तराम बाबा खटिया पर विश्राम कर रहे थे। उस दिन की याद करके अन्नतराम गुप्त जी का यह श्लोक याद आने लगता है-

पीठासीनं विशालकायम्।

ब्राह्मण कुलोद्भवम्।।

नमामि गौरीशंकराय।

परमहंसम् अद्भुतम्।।

अर्थात् वे विशाल शरीर वाले कुर्सीपर बैठे हुये हैं। ब्राह्मण कुल में पैदा हुये हैं। ऐसे अदुभुत परमहंस गौरीशंकर बाबा जी को मेरा प्रणाम है।

अवधूत बाबा गौरी शंकर के किस्से 1

उनका नाम है गैारीशंकर बाबा। किन्तु लोग उन्हें मस्तराम बाबा के नाम से जानते हैं। आस-पास बैठे उनके भक्त कुछ गुनने में लगे थे। मस्तराम महाराज सूने में इस तरह बतिया रहे थे जैसे कोई उनके सामने बैठा उनकी बातें सुन रहा हो। अन्ट-सन्ट की भाषा,भक्तों की समझ न आ रही थी। अनजान आदमी तो उन्हें पागल ही समझ लेगा। इस क्षेत्र के लोग उनके इस गूढ रहस्य को समझ गये हैं।

इसी समय एक आदमी बाबा के पास आया। उसने भी सभी की तरह उनके चरण छुये और बोला-‘‘जै सियाराम बब्बा।’’

यह सुनकर उनके मुँह से निकला-‘‘जै सियाराम।’’ ये शब्द उनके अन्तस् से इस तरह निकले जैसे किसी प्रियजन का नाम हमारे मुँह से निकलता है। वह व्यक्ति हाथ जोड़े किसी आदेश की प्रतिक्षा में उनके सामने खड़ा रहा। अब मस्तराम महाराज ने उसकी ओर देखे बिना चन्द्रमा की स्तुती का यह मन्त्र बोलना शुरू किया-

‘‘ रोहिणीश सुधामूर्तिः, सुधागात्रो सुधाशनः।

विशाम स्थान सम्भूतां, पीड़ां दहतु मे विधुः।।’’

‘‘चन्द्रमा के दर्शन करै, यह मन्त्र बेाला और लैाट गये। चन्द्रमा के दर्शन करै यह मन्त्र बेाला और लैाट गये। चन्द्रमा के दर्शन करै यह मन्त्र बेाला और लैाट गये।’’ बाबा का यही बात तीन बार कहना ,किसी की कुछ समझ नहीं आरहा था।यह सुनते हुये वह आदमी सब के बीच में बैठ चुका था। सभी ने प्रश्न भरी निगाह से उसकी ओर देखा तो वह स्वतः ही बोला-‘‘बाबा मुझे छमा करैं। मुझे दमा की बीमारी है। मैंने बाबा से निवेदन किया था । बाबा के इस मन्त्र से मुझे बहुँत फायदा है। मैं रोज यहाँ आने के लिये दुकान बढाकर चलता किन्तु रेल्वे क्र्रासिंग तक आते-आते चन्द्रमा दिखता, बाबा जो मन्त्र अभी-अभी बोल रहे थे मैं बोलता और यह सोचते हुये लौट जाता, आज देर हो गई कल आऊगा। इस तरह मैं तीन दिन से लौट रहा था।

यह सुनकर सभी अपने अन्दर कुछ सहेज कर रखने लगे। कुछ अनास्थायें निकाल फेंकने लगे। मेरे मन में भी द्वन्द छिड़़गया। जादू के खेल और वास्तविक तथ्यों में अन्तर करना आ ही गया है। यों आस्थाओं को विजय श्री मिल गई।

इस घटना के बाद तो जब मौका लगता मैं उनके दर्शन करने जाने लगा। हर बार आस्थायें पैदा करने वाले प्रसंग उनके भक्तों के संस्मरणों में सुन पड़ने लगे। आस्थाओं के पग स्थिर होने लगे।

मेरे पिता जी श्री घनसुन्दर तिवारी बाबा के अनन्य भक्त थे। हमें कुआ खुदाना था। प्रश्न खड़ा हुआ कुआ किससे गुनाया जाय। क्षेत्र भर के कुआ गुनने वालों के नाम गिनाये जाने लगे। पिताजी बोले-‘‘ मैं तो मस्तराम बाबा से ही अपना कुआ गुनाऊंगा।’’

बाबा को आमंत्रित करने मैं भी पिताजी के साथ गया था। उन दिनों बाबा हमारे जिले ग्वालियर के बिलउआ गाँव में थे। यह सुनकर मन मयूर सा नाचने लगा। इस बहाने बाबा की जन्म स्थली के दर्शन करने का मौका हाथ लग रहा था। कितना भाग्य शाली है वह स्थल जहाँ ऐसे महापुरुष ने जन्म लिया है। मेरे कौन से जन्म के पुण्य उदय हुये हैं जिसके कारण ऐसे तीर्थ के दर्शन का लाभ हो रहा है। इस तरह जाने क्या-क्या सोचते हुये बाबा के पास पहुँच गया। वे अपने भतीजे के घर ठहरे हुये थे। पौर में पलंग पड़ा था। जिस पर वे बैठे मस्ती में झूम रहे थे। अर्न्तमन स्वतः नमन के लिये झुक गया। सिर चरणों में रख दिया। मेरे मुँह से शब्द निकले-‘‘जय सियाराम बाब्बा।’’

उन्होंने आशीर्वाद दिया-‘‘जय.... सियाराम.....।’’

पिताजी ने डरते-डरते अपनी बात रखी-‘‘बाबा आप सब जानते है, गरीव आदमी हूँ। घर के सामने मेरे पास थोड़ी सी कृषि भूमि है उसमें कुआ खुदाना चाहता हूँ। इच्छा है कि आप उसमें कुआ गुन दें, बच्चे पल जायेंगे।’’

बात सुनकर वे उनकी ओर देखते रहे फिर ओगढ़ भाषा में बोले-‘‘ठीक है ब्याना तो दे।’’

पिताजी ने पाच का नोट उन्हें अर्पित कर दिया और चरण छू लिये। वही उनके भतीजे नरेन्द्र तिवारी बैठे थे। बाबा उनसे बोले-‘‘ नरेन्द्र मुहुर्त तो बता।’’

पं0नरेन्द तिवारी ने पंचाग निकाला। पन्ना उलट-पलटकर दिन और समय बाबा से निश्चित करा दिया। उसके बाद बाबा की ही अनुमति से वापस लौट आये।

बाबा को मुहुर्त से एक दिन पहले पिताजी लेकर आये थे। बाबा के आते ही घर का वातावरण बदल गया। घर बाबा का आश्रम बन गया। घर के प्रत्येक व्यक्ति की दिनचर्या बदल ही गई। उनके भक्त लोग दर्शन के लिये आने लगे।

चाहे कोई आये चाहे जाये,बाबा हर पल समाधि की अवस्था में दिखते। कोई उत्तर देना होता अथवा किसी से कुछ कहना होता तो ऐसे लगता जैसे समाधि में ही डुवे रह कर बोल रहे हैं। उनकी अन्ट-सन्ट की भाषा इस बात का प्रमाण थी। समाधि के अन्दर से निकले शब्द अस्त- व्यस्त होने से भक्तों को अर्थ लगाने में दिमाग पर जोर डालना पड़ता । फिर जो भाव उभरता उसे वह श्रध्दा-विश्वास से ग्रहण कर लेता। यों नियन्ता का खेल देख सभी आश्चर्य चकित होने लगे।

मैं तो आज भी उनकी उन बातों का अर्थ लगाने में लगा रहता हूँ।

दूसरे दिन की बात है। गाँव के लोग मुहुर्त से पहले इकत्रित होगये। मुहुर्त का समय हो गया। कुआ खोदने की पूरी तैयारी करली। बाबा समाधिस्त हो गये। बाबा के समाधि से उठने की सभी प्रतीक्षा करने लगे। मुहुर्त की बात बाबा से कैान कहे?उनसे किसी की निवेदन करने की हिम्मत ही नहीं पड़ रही थी। भीड़ में सन्नाटा पसरा था।सभी एक दूसरे का मुँह ताक रहे थे। मुहुर्त का समय निकल गया। कुछ लोग मेरे कान के पास आकर फुसफुसाये-‘‘बाबा से निवेदन तो कीजिये।’’मैं हतप्रभ सा बैठ था।बात सुनकर चेतना आगई। मैं उठा और बाबा के सामने हाथ जोड़कर खड़ा होगया। मेरे मुँह से शब्द निकले-‘‘बाबा मुहुर्त तो निकल गया!’’ यह सुनकर बाबा उठे घर से निकलकर सामने खेत में पहुँच गये। एक खेत पार करके दूसरे खेत में जा पहुँच । उसमें भी काफी अन्दर तक चले । एक स्थान पर जाकर रुक गये और बोले-‘‘इस जगह पर खूटा गाड़ दो।’’

पिताजी खूटा लिये थे,उन्होंने उस स्थान पर खूटा गाड़ दिया।

बाबा बोले-‘‘इसे यहीं ठोकते जाना।’’ यह कहकर बाबा ने पाँच तस्सल मिट्टी स्वयं खेादकर डाली। यह देखकर हमारा उत्साह बढ़ गया। हम भी मिट्टी खेादकर बाबा की तरह डालने लगे। कुआ खुदना शुरू होगया। बाबा पाँच छह दिन तक घर रहे। अन्य लोगों की तरह मैंने कब्बड़ी के

खेल में टूटे अपने हाथ के बारे में बाबा से पूछा-‘‘बाबा मेरा टूटा हाथ ठीक हो जाये।’’

यह सुनकर वे बोले-‘‘इसके लिये तुम्हें दादर जाना पड़ेगा।’’

उनकी यह बात सुनकर मैं चुप रह गया था। इस बात का आज भी अर्थ निकालने में ला रहता हूँ। कभी सोचता- इस का इलाज कराने दादर‘मुम्वई’ जाना पड़ेगा। वहाँ ही इसका इलाज सम्भव है। यह सोचते-सोचते वूढा हो गया। आज तक दादर नहीं जा पाया। अब सोचता हूँ क्या पता अगला जन्म ही मेरा दादर में हो। उस नये जन्म में वहाँ मेरा हाथ ठीक हो ही जायेगा। यों दादर जाने का यह अर्थ भी निकलता रहता हूँ। सच क्या है यह तो बाबा ही जानें।

कुआ खेदने का कार्य मजदूर करने लगे। बाबा की सेवा का दाइत्व पिता जी ने अपने पास रखा। दिन-रात पिताजी बाबा के पास बैठे रहते। उनकी ओर टकटकी लगाये देखते रहते। बाबा चाहे तख्त पर बैठे हो, चाहे लेटे हो वे हर पल समाधि में रहते। कभी-कभी वे रात भर बैठे और कभी लेटे रहते ।

रात के दो बजे का समय रहा होगा। मेरी नींद उचट गई। मेरे चित्त में आया कि देखू तो बाबा क्य कर रहे हैं? मैं पौर में पहुँच गया। बाबा समाधि में लीन थे। पिताजी उनके पास बैठे आन्नद में कुछ पी रहे थे। मैं ठिठक गया। पिताजी समझ गये मैं क्यों ठिठका हूँ। उत्तर सुनने मैंने अपने कान पिताजी के पास कर दिये जिससे बाबा को साधना में व्यवधान न हो। पिताजी धीरे से फुसफुसाये-‘‘मैंने तो बाबा के मूत्र का प्रसाद ग्रहण कर लिया।’’यह सुनकर में अपने कमरे मैं लौट आया।

उस दिन से पिताजी की जीवनचर्या ही बदल गई थी। दिन भर की मानसिक पूजा का क्र्र्र्र्रम शुरू हो गया था। पिताजी की ये बातें मैं भूल नहीं पाया हूँ। वे कहा करते थे कि बाबा को उन्होंने बाजार में पहली वार देखा था ,उस समय वे ताडाधींगा- ताडाधींगा कहते हुये घूम रहे थे। उस समय इन्हें वे पागल ही लगे थे। उन्हीं की कृपा से पिताजी का दृष्टि कोंण बदला और वे उनके दर्शन करने के लिये जाने लगे थे। इसके बाद तो वे जब भी डबरा जाते, बाबा के दर्शन किये बिना न लौटते। एक वार बाबा ने इन्हें कुछ रुपये दिये और कहा-‘‘ इन्हें जेब में रख ले और बटन लगा ले।’’ इन्होंने बटन तो लगा लिये किन्तु वे रुपये खर्च कर दिये। जिसका उन्हें जीवन भर पश्चाताप रहा।

लिखने और छपने की लालसा से मैंने अपनी रचनायें आशीर्वाद पाने बाबा के सामने रख दीं। वे उन्हें बिना पढे उलट-पलट कर देखते हुये बोले-‘‘हाँ...ठीक हैं,अश्लील नहीं हैं।’’

यह कहकर उन्होंने उन पर अपने हस्ताक्षर कर दिये और बोले-‘‘देर लगेगी सब छप जायेंगी।’’

मैंने उनकी अश्लीलता वाली बात गाँठ बाँध ली। उस दिन से लिखते समय यह बात ध्यान में रहती है कहीं किसी तरह की लेखन में अश्लीलता न आजाये। यह बात वेद मन्त्र की तरह चित्त में बैठ गई है। इसी कारण मेरी रचनओं में अश्लीलता नाम की कोई बात नहीं मिलेगी। आज इस के लिखते समय तक ग्यारहवी कृति दिल्ली के विश्व विजय प्रकाशन से प्रकाशित हो चुकी है। आज की तिथि में बाबा की कृपा से छपने की कोई समस्या नहीं है।

उन दिनों मैं अपने गाँव में ही शिक्षक था। शाम चार बजे के बाद विद्यालय से लैट रहा था। घर के दरवाजे पर खटिया पड़ी थी ,उस पर बाबा विराजमान थे। मुझे आते देख उन्होंने तकिया उठाया। मैं समझ गया बाबा मुझे कुछ देना चाहते हैं। कहीं पैसे-वैसे दे रहे हो। सन्तों से क्यों चाहिये पैसे। उनकी कृपा के बदले हमें ही उनकी सेवा करना चाहिये। यह सोचकर मैं वहाँ रूका नहीं,घर के अन्दर पहुँच गया। अन्दर जाकर रेडियो खेाल लिया। फिल्मी गाने सुनने लगा। एक मिनट बाद ही भूल गया कि मुझे बाबा के पास नहीं जाना चाहिये। मैंने अपना मन पसन्द गाना न सुनकर रेडियो बन्द कर दिया।....और बाबा के पास जा बैठा। बैठते ही बाबा मुझे दस का नोट देने लगे।बोले-‘‘ले।’’

मैंने निवेदन किया-‘‘इनका मैं क्या करूगा?’’

वे बोले -‘‘रख ले,कनागतों में काम आयेंगे।’’

मुझे उनकी वह कृपा प्राप्त करना पड़ी।उस दिन से कभी मेरी जेब खाली नहीं रही। दीपावली के दिन लक्ष्मी पूजन के समय उन्हीं की पूजा की जाती है। किन्तु जब भी कनागत यानी पितृपक्ष आते हैं। मैं सोचने लगता हूँ-बाबा ने कनागतों में इनके खर्च की बात कही थी।

यों सोचते-सोचते लम्बा समय गुजर गया। पिताजी के साथ बद्रीनाथ यात्रा का संयोग बन गया। यमनोत्री,गंगोत्री,केदारनाथ की यात्रा से निवृत होकर जब हम बद्रीनाथ पहुँचे , कनागत पक्ष शुरू होगया। यह बिचित्र संयोग ही था।

कनागत पक्ष में ब्रह्मकपाल पर पिन्डदान का विशेष महत्व है। पिताजी के द्वारा पिन्डदान का कार्यक्रम कराया। जब इस कार्य से निवृत हुये,बाबा के कनागतों की बात याद हो आई। इतने समय पूर्व बाबा ने जो बात कही थी वह पूरी हो गई।