अपने ऊपर विश्वास Anand M Mishra द्वारा आध्यात्मिक कथा में हिंदी पीडीएफ

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अपने ऊपर विश्वास

अपने पौराणिक ग्रंथों को पढने से एक बात जो समझ में आती है वह यह कि जिंदगी बहुत बार ऐसे उतार-चढ़ावों से गुजरती है, जिनपर हमारा जोर नहीं चलता। पर, कुछ चीजें हैं, जो हमारे हाथ में होती हैं। ये वो चीजें हैं, जिन पर काम करना हमारी जिंदगी को कुछ आसान और आरामदायक बना देता है। अपने जीवन को सहजता की ओर ले जाने का सामर्थ्य हमेशा मानव के पास होता है। श्रीराम का राज्याभिषेक होनेवाला था लेकिन उन्हें वन में जाना पड़ गया. परिस्थितियों को अपने वश में करते हुए, वन में रहते हुए वे यशस्वी कहलाए. अगर वे अपने को उस वक्त बेबस, बेमकसद पाते तो वे मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम नहीं बन पाते. जिंदगी का उन्होंने लक्ष्य तय किया और वे चल पड़े. उन्होंने वन-प्रवास पर अपने अनुज सहित ध्यान दिया.

केवल प्रवास पर ध्यान देने से उन्हें संतुष्टि मिली. अपना समय ऋषि-मुनियों, शोषितों, वंचितों से मिलने में लगाया. ज्ञानार्जन जीवन का उद्देश्य हो गया. उन्होंने जीवन को एक अर्थपूर्ण दिशा देने में कामयाबी पायी. कुल-परंपरा का ध्यान रखते हुए श्रीराम ने अपने पिताजी को खुश रखने की कोशिश की. यह अलग बात है कि उनके पिता खुश नहीं रह सके. कई बार ऐसा होता है कि जीवन में अपने मन की, अपनी चाह की राह पर चलना कठिन होता है. दूसरों के बताए रास्ते पर चलकर मार्ग बनाना आसान नहीं होता. अंतर्मन की आवाज सुनकर, उस पर भरोसा करने से सही राह मिल जाता है. जिंदगी आगे की ओर बढ़ने लगती है. आवश्यकता सही लोगों के साथ रहने की है. श्रीरामजी सुग्रीव, विभीषण तथा हुनमानजी, जामवंतजी आदि का साथ मिला. समस्या अच्छे लोगों के पहचान करने की है. प्रायः ऐसा होता है कि जिन्हें हम अच्छे लोग समझते हैं वे राक्षस से भी अधिक खतरनाक होते हैं. वैसे बड़े-बूढ़े कहते हैं कि हम जैसे हैं, वैसे ही व्यक्ति से हमारी मित्रता होगी. संकल्पों को पूरा हम अपने आसपास संसाधनों से ही कर सकेंगे. पूरी रामायण में श्रीराम ने कहीं भी अयोध्या से सहायता की उम्मीद नहीं की. जो भी उन्हें वन में मिला, उसी को अपने संकल्प सिद्धि में लगाया. रावण जैसे आततायी से लोहा लेने के लिए बड़े संकल्प की आवश्यकता थी. लेकिन उन्हें अपने सहयोगियों पर पूरा भरोसा था और उस भरोसे के साथ उन्होंने लंका पर चढ़ाई की. हम कल्पना करें कि आज के समय में यदि श्रीराम लंका पर चढ़ाई पर करते तो क्या हाल होता? हो सकता है कि हनुमानजी उनका साथ छोड़कर लंका के राजा के साथ मिल जाते. सुग्रीव भी उनका साथ छोड़ सकते थे. लेकिन श्रीराम को स्वयं पर दृढ विश्वास था. वे अपने सोचे हुए रास्ते पर उसी विश्वास के साथ बढ़ते गए और जीवन को गति प्रदान करने में कामयाब हो गए. वे भीतर से काफी मजबूत थे. केवल एक जगह उन्हें कमजोर पाया जब लक्ष्मण को शक्ति बाण लगी थी. उस वक्त वे असहाय की तरह विलाप कर रहे थे. लेकिन उनके भाग्य में हनुमानजी की तरह सेवक थे. मौत के मुंह से लक्ष्मणजी को निकाल लाए. अतः अच्छे नोगों की भी भूमिका किसी को बनाने में होती है। हम उनके अनुसार ढलते हैं, जाने-अनजाने उनकी राह ही चलने लगते हैं। प्रसन्नचित्त, दूसरों को सहयोग देने वाले लोग यदि हमारे पास हैं तो हम कभी असंतुष्ट महसूस नहीं करेंगे। जीवन कठिन नहीं लगेगा. कितनी घटनाओं को जाना-समझा है जब पडोसी आपस में एक दूसरे की मदद करते हैं. जहाँ पडोसी मदद नहीं करनेवाले होते हैं उस जगह निवास करना भी भारस्वरूप हो जाता है. पडोसी के साथ रिश्तों में हमारी कुछ उम्मीदें भी जुड़ी होती हैं। अपने लोगों से कुछ उम्मीद रखना, किसी तरह की खुदगर्जी नहीं है। बेहतर है कि हम ऐसे लोगों के साथ रहें, जो हमें पसंद हैं, जो हमारे शुभचिंतक हैं।

जो इच्छाएं हमारे दिल के करीब होती हैं, उन्हें हम पूरा करने में भी सक्षम होते हैं। रोमांचक काम करने से परेशानी होती है। लेकिन यदि रोमांचक कार्य नहीं किया जाता तो आज कुछ भी अविष्कार नहीं होता. अतः हम कुछ ऐसा करें, जो नया हो. वैसे हम हमेशा अपने बाहरी हालातों पर काबू नहीं पा सकते, पर अपनी सोच को सही दिशा जरूर दे सकते हैं। अपनी जीवन प्रक्रिया पर भरोसा करना ही श्रेयस्कर है.