नाट्यपुरुष - राजेन्द्र लहरिया - 5 राज बोहरे द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

नाट्यपुरुष - राजेन्द्र लहरिया - 5

राजेन्द्र लहरिया-नाट्यपुरुष 5

 

यह बताने के बाद रणजीत कुछ पलों तक चुप रहा। उस वक्त उसके चेहरे पर बेचैनी की रेखाएँ खिंची हुई थीं। उसके बाद वह फिर अपनी बीती पर आ गया, ''सर, पिता ने मेरा दाख़िला एक केंद्रीय यूनीवर्सिटी में कराया था - राजनीति पढऩे के लिए - इसलिए कि मैं आगे चलकर एक वेल ऐजूकेटेड राजनीतिक बनूँ और उनकी विरासत को आगे बढ़ाऊँ!... और मैं, राजनीति पढ़ रहा था - राजनीतिक बनने के लिए नहीं, बल्कि राजनीतिशास्त्रियों के विचारों से दो-चार होने के लिए! मैं मानता हूँ कि वह अध्ययन-काल मेरे जीवन का सबसे कीमती समय था; क्योंकि उसमें सब कुछ खुला था- खुलकर बातें करने के अवसर, खुलकर बहसें करने की छूटें और खुल कर निष्कर्ष निकालने की ज़हनियत...! और इसलिए भी कि उसी अध्ययन-काल ने मुझे अपने इस निष्कर्ष तक पहुंचने की सलाहियत दी थी कि 'राजनैतिक सिद्धांत’ और 'राजनैतिक जीवन’ दो बिल्कुल भिन्न चीजें होती हैं!

''और बहरहाल, अपना अध्ययन पूरा कर लेने के बाद मैं अपनी दुनिया या कहूँ अपनी मनचाही दुनिया के बीच आ गया था... मेरी दुनिया अब समाज के उन तबकों और लोगों के बीच थी जो हमेशा हाशिए पर ही रखे जाते रहे हैं और राजनीति के लिए महज़ वोट-संसाधन से अधिक कोई अहमियत नहीं रखते रहे हैं! मैं एक योजना के साथ कायदे से उनके बीच जाता और उनकी जीवन-शैली, उनके विचार, उनकी आकांक्षाओं, उनके सपनों और उनकी समस्याओं का अध्ययन कर उन्हें दर्ज करता... मेरा वह अध्ययन मेरी निधि है, मेरी पूँजी है, जो मेरे लिए मेरी एकेडिमिक अध्ययन के बाद मिली डिग्री से ज़्यादा महत्व रखती है!

''पर मेरे उस तरह से, अपनी दुनिया में चले जाने से मेरे पिता को निराशा हुई थी और खिन्नता भी।’’

''इस दरमियान मैं तक़रीबन कई वर्षों तक गांवों में रहा - किसानों और खेत मज़दूरों के बीच। दो साल मैंने बंजारों, बेडिय़ों, लोहपीटों - जैसे जनसमुदायों के बीच बिताये एक साल क़स्बों में चलने वाले छोटे-छोटे कारख़ानों में काम करने वाले मज़दूरों, महिला-मज़दूरों और बाल-मज़दूरों की जीवन-स्थितियों को समझने में बिताया। उसके बाद, मैंने शहरों में तरह-तरह के पेशे करने वालों का अध्ययन किया... जैसे कि फेरी वाले, रेहड़ी वाले, खोमचे वाले, ताँगे वाले, ऑटोरिक्शा वाले... और मैं उन लोगों के बीच कभी जींस का पैंट और खाली कुरता पहन कर नहीं गया... उनके ही जैसी साधारण वेशभूषा के साथ उनके पास बैठता-उठता, उनके काम में हाथ बँटाता, उनके हमपेशा-जैसा बन कर रहा उनके बीच!...तो उसी सिलसिले में उन दिनों मैं ऑटोरिक्शा वालों के बीच था... तभी एक दिन वह वाक़या हुआ, जिसने मेरे भीतर नफ़रत की बजबजाहट और साथ ही एक चमकदार ख़ुशी पैदा की थी... यह बिल्कुल भी इत्तिफ़ाक नहीं था कि प्रौफेसर पाणिग्रही उस दिन वहाँ थे! मैंने उन्हें देखते ही पहचान लिया था - बावजूद इसके कि उनका चेहरा कुछ बदला-बदला सा था! बेशक वे तब भी अपने पैंट-कुरते वाले लिबास में ही थे; उनका चेहरा भी पहले की ही तरह क्लीनशेव्ड था - बेशक कुछ ढीला और लटका हुआ नज़र आ रहा था। हाँ, उनके सिर के बालों की सूरत पहले जैसी न थी। वे तब रिटायर्ड हो चुके होंगे; क्योंकि वैसा उनकी उपस्थिति साबित कर रही थी: यह पहली बार था कि उन्हें मैंने आम रोड पर उनकी कार के बिना पैदल देखा था!... पर बहरहाल, मैंने उन्हें पहचान लिया था। हालांकि वे मुझसे तक़रीबन पच्चीस तीस फीट की दूरी पर थे; और मुझे लगा था कि वे मेरी ही तरफ़ देख रहे थे। मैं थोड़ा-सा उनकी तरफ़ बढ़ा, और मैंने अपना दायाँ हाथ अपने सीने की तरफ़ ले जा कर उन्हें वहीं से 'नमस्ते सर!’ कहा, जिसे संभवत: उन्होंने सुना नहीं था; बेशक वे देख मेरी ही तरफ़ रहे थे। मेरे भीतर उस वक़्त उनके लिए पूर्व परिचय के कारण अपनापा और सम्मान पैदा हो रहा था जिसे मैं यह कह कर प्रकट करना चाह रहा था कि 'कैसे हैं सर?’... परंतु इससे पहले कि वे शब्द मेरे मुंह से निकल पाते, उन्होंने मुझसे कहा था, 'शकुंतलापुरी चलोगे?’ उनके वे शब्द मेरे लिए अप्रत्याशित थे। एक बारगी तो मैं कुछ समझ ही न पाया कि उनका आशय क्या है! फिर मुझे एक झटका-सा लगा था - दरअसल मेरे दिमाग की बत्ती जल उठी थी कि प्रोफेसर पाणिग्रही ने मुझे पहचाना ही नहीं था और वे मुझे एक ऑटोरिक्शा-ड्राइवर समझ रहे थे; क्योंकि मैं उस वक़्त ऑटोरिक्शा-ड्राइवरों के बीच था! वे जवाब के लिए मेरी तरफ़ देख रहे थे। और हठात् मेरे मुँह से निकला था, 'नहीं!’ यह सुन कर वे दूसरी तरफ़ देखने लगे थे।

''और सर, इनीशियली तो उस वाक़ये के कारण मैं इस तकलीफ़ से भर उठा था कि प्रोफेसर पाणिग्रही ने मुझे पहचाना नहीं! पर अगले ही पल मेरे भीतर ख़ुशी का एक फव्वारा-सा फूट उठा था कि प्रोफेसर पाणिग्रही ने मुझे सांसद अखिलजीतबाबू का बेटा रणजीत नहीं, बल्कि ऑटोरिक्शा-ड्राइवरों के साथ होने के कारण एक ऑटोरिक्शा-ड्राइवर समझा; और वे अपनी उन तमाम दलीलों के साथ ग़लत साबित हुए जो उन्होंने यूनीवर्सिटी के दिनों में एक दिन लोकतंत्र में 'आम’ और 'ख़ास’ के फ़र्क को सिरे से नकारते हुए दी थीं!... मुझे लग रहा था कि वह बहस अब तक जारी थी और उसमें अंतत: मैं सही साबित हुआ!

''और फिर मेरे भीतर अचानक उनके लिए नफरत की बजबजाहट उठ खड़ी हुई थी। शायद वह मेरी नफ़रत का विस्तार था - राजनीति से नफ़रत का विस्तार। राजनीति के कर्म के चेहरे के रूप में मैंने अपने पिता को देखा था, जिनसे मैं एक ठंडी क़िस्म की नफ़रत करता था; और उसके बाद मेरे सामने राजनीति के सिद्धांत के चेहरे के रूप में प्रोफेसर पाणिग्रही थे, जो मेरी नफ़रत के विस्तार का कारण बने थे! ...और उस वक़्त उस नफ़रत ने ही मेरी ख़ुशी को चमकदार बना दिया था।’’

अपनी आपबीती सुनाकर पूरी करने के बाद रणनीत के चेहरे पर एक अजीब तरह की ख़ुशी नुमाया थी...

 

क्यू में लगे बूढ़े ने हठात् 'महामहिमावान’ के अभिनंदन-मंच की ओर देखा, तो उसे रणजीत की आत्मकहानी के अखिलजीतबाबू के सफेद बालों और स्वागत-मंच पर मौजूद 'महामहिमावान’ के दूर से ही दिखाई दे रहे सफेद बालों में एक आश्चर्यजनक समानता दिखी!

उसके बाद बूढ़े ने एक बार फिर अभिनंदन-मंच से खुद की दूरी देखी: बहुत अधिक न थी! बस, कुछ ही समय और लगेगा कि वह 'महामहिमावान’ तक पहुँच जायेगा। उसी आत्म-आश्वस्ति ने उसे धूप और गर्मी से कुछ राहत दी।

और वह एक बार फिर अपने रंग-मंच के साथ था:

 

रंग-मंच पर ऐसा नीम उजाला है, जिसमें शक्लें ठीक-से दिखाई नहीं दे सकती हैं। महज़ आकृतियाँ भर नज़र आ सकती हैं। मंच के उस नीम उजाले में नेपथ्य से कुछ अस्पष्ट आवाज़ें आ रही हैं। और यकायक पाश्र्व से निकल कर कुछ मनुष्य-आकृतियाँ रंग-मंच के नीम उजाले में दिखाई देने लगीं। उन सभी आकृतियों के मुँह एक ही दिशा की तरफ़ हैं और उनकी तर्जनियाँ एक ही दिशा की तरफ़ तनी हुई हैं। अब उनकी आवाज़ें स्पष्ट सुनाई दे रही हैं:

एक आवाज़ : ''तुम बर्बर!...’’

दूसरी आवाज़ : ''लोकतंत्र में बर्बर!...’’

तीसरी आवाज़ : ''लोक ने तुम्हें शक्ति सौंपी थी... इस आस-उम्मीद के साथ कि तुम उसकी रक्षा करोगे, उसे प्रसन्नता दोगे...’’

चौथी आवाज़ : ''पर तुम बर्बर!.... पल-पल रंग बदलते हो- गिरकिट की तरह- अवसरानुसार...’’

पांचवी आवाज़ : ''तुम बर्बर! अपमान करते हो निर्दोष मनुष्यता का!... तुम ऐसे अमानुष कि सोफे पर बैठे धुले बालों वाले कुत्ते का लाड़ से भर कर सिर सहलाते हो; और उस मनुष्य-मजूर-बच्चे को दुत्कार देते हो जो अनायस तुम्हारी छाया के पास आ जाता है।’’

छठवीं आवाज़ : ''तुम बर्बर! शिकार करते हो स्त्री जात का-सरेराह, सरेआम और कभी अँधेरे की ओट में!...’’

पहली आवाज़ : ''तुम बर्बर!....’’

दूसरी आवाज़ : ''लोकतंत्र में बर्बर!....’’

तीसरी आवाज़ : ''लोक ने तुम्हें शक्ति सौंपी थी... इस आस-उम्मीद के साथ कि तुम उसकी रक्षा करोगे, उसे प्रसन्नता दोगे...’’

एक अन्य आवाज़ : ''पर तुम बर्बर! पशु की रक्षा हेतु मनुष्य की हत्या करते हो!...तुम धर्मभीरू! ...तुम जातिभीरु!.... तुम आत्मभीरु!... डरे हुए हर समय... पहने रहते हो मनुष्यों का कवच हमेशा - अपनी देह-रक्षा के लिए! और साथ ही लोक के अपमान के लिए!... तुम नृशंस!...’’

एक और आवाज़ : ''तुम बर्बर!... इंडिविजुअल नहीं हो तुम... तुम समूह हो - एक प्रवृत्ति हो!... 'लोक’ की सौंपी शक्ति से उन्मत्त तुम! मनुष्य-कवच से सुरक्षित होकर मदमस्त तुम। भूल गये हो कि तुम्हारी शक्ति 'लोक’ से मिली है तुम्हें!...’’

एक अन्य आवाज: ''बताओ, 'लोक’ द्वारा सौंपी शक्ति से सम्पन्न हो कर तुम कैसे बन गये 'लोक’ के ही भक्षक?... 'लोक’ द्वारा सौंपी शक्ति के कारण इतराते तुम अपने-आपको कैसे मान बैठे 'लोक’ से ऊपर?... बताओ, तुम बर्बर! यह ज़मीन-देश के नक्शे की ज़मीन क्या तुम्हारी बापौती है? क्या इस पर चलने का हक़ सिर्फ तुम्हारा है कि छेंक दी जायें तुम्हारे लिए चौड़ी-चौड़ी सड़कें; और 'लोक’ सिमट जाये एक तरफ़ को या दुबक जाये अपने-अपने घर में! कि जिनसे गुज़रना तो तुम्हें अपने लाव-लश्कर के साथ, अपने सुरक्षा-कवच के साथ- लंबी-लंबी, कानफोडू हूटर बजाती गाडिय़ों के काफ़िले के बीच, ख़ाली कर दिये जायें वे मार्ग!?!... तुम बर्बर! बताओ, लोक की सौंपी शक्ति से बने तुम कैसे बन गये लोक-विपरीत?... तुम नृशंस ऐसे कि अपने रसूख और रुतबे की रक्षा के लिए अपने मार्ग में आ गये मासूम 'लोक’ को बर्बरता से कुचल डालने पर आमादा...!’’

एक और आवाज़ : ''बताओ, तुम बर्बर!... बताओ! उस समय तुमको कैसा महसूस होगा, यदि कोई तुम्हारे मनुष्य-कवच को बेध कर तुम्हारी अस्मिता को कुचल डाले!... बताओ! तब तुम्हें कैसा लगेगा!?!...’’

रंग-मंच के नीम उजाले में अब तक स्थिर खड़ी बोल रही मनुष्य-आकृतियाँ, अब रंग-मंच पर आगे बढऩे लगती हैं। इसके साथ ही नेपथ्य से एक ख़ास लय-ताल में बजती तबला-ध्वनि सुनाई देने लगती है...

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