वीरों की गाथा Kamini Gupta द्वारा प्रेरक कथा में हिंदी पीडीएफ

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वीरों की गाथा

वीरों की गाथा

कामिनी गुप्ता

भारत में बहुत से महान योद्धा हुए हैं, जिन्होंने अपनी जान की कुर्बानी देने में एक क्षण के लिए भी नहीं संकोच किया। अपने वतन की आन, शान बचाने के लिए वहादुरी से दुश्मन से लोहा लेते हुए प्राणों को न्योछावर किया। इतिहास में ऐसे कितनी तरह के छोटे बड़े युद्ध हुए हैं, जिन्हें हम जानते हैं और शायद कुछ नहीं भी । ऐसे युद्धों में हर देशवासी हर शहीद को दिल से सलाम करते हैं और उन्हें प्रेरणा स्रोत्र बनाकर कहीं उनके नाम को यादगार बनाने के लिए स्मारक, या पार्क या किसी -किसी मार्ग को ही उनका नाम दिया जाता है जो देशवासियों का अपने वीर योद्धा के प्रति सम्मान भी व्यक्त करता है। उनकी वीरता को नमन करते हुए एक यादगार चिन्ह के रूप में स्थापित किया जाता है, जो पल-पल हमें उनके किए गए बलिदान की याद दिलाता है।

  • बहुत से ऐसे वहादुर युवा योद्धा भी हैं जिन्होंने बहुत ही कम उम्र में वतन के लिए अपने प्राणों की आहुती दी। ऐसे ही सैनिक कालौनी जम्मू में भी ऐसे वीर सपूत जन्मे जिन्होंने अपने फर्ज को निभाते हुए अपने प्राणों की परवाह न करते हुए अपने साथियों और वतन के लिए कम उम्र में अपना बलिदान दिया । उन पर हम सबको पूरे वतन को और माँ -बाप को भी गर्व है जिन्होंने उन्हें ऐसे संस्कारी दिए।
  • करगिल युद्ध को कौन भूल सकता है ? पाकिस्तान जो हमारा पड़ोसी होने के साथ-साथ हमारा दुश्मन भी है,ये युद्ध भारत और पाकिस्तान के बीच हुआ था। कईं ऐसे योद्धा भी होते हैं जिनकी कहानियाँ अनकही या अनसुनी भी रह जाती हैं । जिन्हें कुछ लोग जानतेहैं सब नहीं ! युद्ध में शहीद हुए एक ऐसे ही योद्धा की कहानी है जो जम्मू के सैनिक कलौनी का निवासी था।
  • मेजर अजय जसरोटिया जि्न्होने 1972 से 1999 तक का सफर तय किया पर अपने छोटे से सफर में भी खुद की पहचान बहादुरों में करवाई । अजय जसरोटिया जिनके पापा IG थे । अजय जसरोटिया को खेलों में भी बहुत रुचि थी, 1996 में उनकी तैनाती सोपोर कशमीर में हुई थी
  • मे जब करगिल युद्ध छिड़ गया तो युदध के दौरान उनको यूनिट के साथ दुश्मन से जो करगिल में ऊंची चोटी पर कब्जा कर बैठा था उससे वो कब्जा छुड़ाना था। अपनी यूनिट के साथ अजय जसरोटिया बड़ी ही बहादुरी के साथ आगे बड़े और लड़ाई की।। इस युद्ध में लड़ाई के दौरान उनको गोलियाँ भी लगीं,जिनकी वजह से उनके ज़ख्मों से बहुत खून बहने लगा। उनकी जान को बचाया जा सकता था अगर समय रहते उन्हें सही ईलाज मिल पाता। पर उस बहादुर ने उस कठिन दौर में भी अपनी जान की परवाह न करते हुए वहाँ से जाने के लिए मना कर दिया और अपने दूसरे ज़ख़्मी साथियों को पास के स्वास्थय केंद्र तक पहुंचाने में सहायता की।। चार जवानों को तो वो बचा पाए, पर उनके जख्म अब गहरे हो गए थे, पांचवे जवान को वो स्वासथ्य केंद्र नहीं पहुंचा सके और अपनी अंतिम सांस ली।
  • अजय जसरोटिया जैसे लोग शायद दुनिया में कम होते हैं, जो दूसरे की जान की कीमत अपनी जान से ज्यादा समझते हैं। उनकी इस बहादुरी और जिन्दादिली ने एक मिसाल कायम कर दी जो अपनी आखिरी सांस तक युद्ध में डटे रहे। अपने साथी और देशवासियों की हिफाजत करते हुए सच्चे मन से देश की सेवा की और धरती माँ का ऋण चुकाया। उनकी इंसानियत और बहादुरी की याद और इस महान शहादत के लिए सैनिक कलौनी के लोग अजय जसरोटिया के नाम से बने पार्क में हर स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस,जन्मदिन और शहादत दिवस पर इकट्ठे होकर उनको श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं।
  • बहादुर और वीर सैनिक मर कर भी नहीं मरते हैं ;
  • जो वतन के लिए मरते हैं वो हर दिल में बसते हैं !
  • उनके इस बलिदान ने देश का सम्मान भी बड़ाया और माता-पिता का भी सीना गर्व से चौड़ा हो गया। उनकी इस बहादुरी के लिए उन्हें राष्ट्रपति द्वारा मरणो उपरान्त “सेना मैडल” से सम्मानित किया गया।
  • उनके सम्मान में सैनिक कालोनी के कवि ने कुछ पंक्तियाँ पंजाबी में यूं लिखी हैं…..
  • देख मौत ऐ दुनिया नसदी, देख मौत मुस्काया
  • खा के गोली रण भूमि बिच,ज़रा नि ओ घबराया
  • ओ भारत माँ दा जाया,ओ भारत माँ दा जाया
  • अपने ज़ख्मा ते मुस्का के, औरा नू बचावे
  • शूरवीर अजय वरगा कोई, बिरला नज़र ऐ आवे
  • दे बलिदान शहीदां दे बिच, नां अपना लखवाया
  • ओ भारत माँ दा जाया, ओ भारत माँ दा जाया
  • खास दिना ते जद- जद ने, लोकी ऐथे आंदे
  • कर फूलां दी वर्षा सारे, बोल ने ऐयो सुनादे
  • मात – पिता ते मातृभूमि दा,अजय ने ऋण चुकाया
  • अजय ने ऋण चुकाया,ओ भारत माँ दा जाया।
  • सैनिक कलौनी के ही एक और बहादुर वीर की कहानी भी दिल को छू जाती है,1969 में जन्मे मेजर ईंद्रजीत सिंह बबर जिनके पिता जी रिटायर्ड कर्नल जी. एस. बबर हैं वे खुद भी एक बहादुर योद्धा रह चुके हैं। बचपन से ही ईंद्रजीत बबर के ह्रदय में देशप्रेम की लगन थी और कुछ कर गुजरने का जज़्बा था। उन्होने एस.एस. सी. की परीक्षा पास की।
  • फिर एक यंग लैफ्टिनैंट के तौर पर उन्होने Regiment of Artillarty ज्वाईन की और उनकी पोस्टिंग 14Fd Regt. में हुई।
  • ईंद्रजीत ने बहुत से मिशन में काम किया फिर उनकी पोस्टिंग असम में हुई। वहां उन्हें असम के डिस्ट्रीकट दरलंग मनालडी की जिम्मेदारी मिली, मिशन RHINO-LL'के तहत जो उल्फा के खिलाफ था। एक जानकारीके अनुसार कुछ आतंकवादियों के किसी के घर में छुपे होने की खबर मिली। वो भारी मात्रा में नए आधुनिक हथियारों से लैस थे । ईंदर्जीत बबर ने उन्हें घेरने की योजना बनाई और दावा बोल दिया। मेजर बबर अपने आफिसर, दो JCO s और 15 OR के साथ बड़े ही योजनाबद्ध तरीके से स्थानिय वाहन का सहारा लेते हुए उनके छिपने के स्थान को हर तरफ से घेर लिय और उनके भागने के सारे रास्ते रोक दिए। आगे की तरफ से अगुवाई करते हुए मेजर ईंद्रजीत अपने साथियों के साथ सभी तरफ से घिरे हुए उन आंतकियो पर टूट पड़े। अचानक सामने से एक आतंकी ने आधुनिक उपकर्ण से फायर किया जो सामने से आ रहे मेजर बबर के स्टामैक में लगा । पर अपने गहरे ज़ख्म की परवाह न करते हुए उन्होने छलांग लगाकर उस आतंकी को दबोच कर वहीं ढेर कर दिया। एक और आतंकी ने दूसरी तरफ से उनके साथी पर ग्रनेड से हमला कर दिया बबर ने लपक कर उस आतकी को भी मौत के घाट उतार दिया।
  • अपने गुरुओं के इन शब्द को स्मरण करते हुए अपने कर्त्तव्य का पालन किया।
  • Jab Aadh udh nidan mile ran mai to juju maroon.
  • इस मिशन में मेजर बबर ने बहुत ही साहसिक लीडरशीप का
  • परिचय दिया और अपनी जान की परवाह न करते हुए भारी आधुनिक फायर और ग्रनेड हमलों के बीच अपनी सूझ बूझ से तीन उल्फा आतंकियों कोऔर एक उनके एरिया कमांडर को मार गिराया और बहुत ही मात्रा में हथियारों का जखीरा और यूनिवरसल मशीनगण, Ak-56 राईफल भी बरामद की । इस मिशन में उन्होने अपनी टीम के किसी भी आफिसर को कोई नुकसान नहीं पहुंचने दिया अपनी जान पर खेल कर इस मिशन को कामयाब बनाया और अपनी अंतिम सांसे ली। इस साहस, सफल लीडरशीप और काबलियत के लिए उन्हें मरण उपरान्त भारत के राष्ट्रपति द्वारा “ कीर्ति चक्र” से सम्मानित किया गया। उनकी याद में सैनिक कलौनी में उनके घर के समीप चौंक पर उनका स्मारक बनाया गया है जिसे बबर चौंक के नाम से जाना जाता है।
  • धन्य हैं वो माता पिता जिन्होंने ऐसे सपूत पैदा किए, जो इन्सानियत और वतन के सच्चे रखवाले थे। हम सभी देशवासी भी हर उस वीर को शत-शत नमन करते हैं जो अपनी जान की परवाह न करते हुए देश की आन,बान और शान के लिए सरहद पर दुशमन की गोली का सामना करते हैं और वतन को हर मुसिबत से बचाते हैं ।
  • ईंद्रजीत बबर की शान में भी उन्ही कवि द्वारा ये पंक्तियाँ पंजाबी में लिखी गई हैं
  • वाह रे बबर, वाह रे बबर, दिला दे बिच तू थां बनाई
  • मातृभूमि लेई जान गंवा के, बिच शहीदां गिनती कराई
  • वाह रे बबर, वाह रे बबर
  • मार के वैरी रणभूमि बिच,तरंगा ऊंचा था लहराया
  • मौत नूं हंस के गले लगा के, मात- पिता दा मान बड़ाया
  • प्रेरणा स्रोत रहें तू बबर, प्रतिमा तेरी है लगवाई
  • वाह रे बबर, वाह रे बबर
  • बनी रहे तेरी याद दिलां बिच, खास दिना ते लोकी आंदे
  • शहादत तेरी दी कर के चर्चा,श्रद्धा दे ने फूल चड़ांदे
  • बोल ने सारे ऐयो कैंदे,देश प्यार दी जोत जलाई
  • वाह रे बबर, वाह रे बबर, दिला दे बिच तूं थां बनाई।
  • सैनिक कालोनी के ही जांबाजो की श्रृंखला में एक और ऐसे ही योद्धा की गाथा दिल में वहादुरों के प्रति स्नेह औ सम्मान की भावना जगाती है। ये गाथा तहसील नौशहरा जिला पुंछ के सुबेदार नैन सिंह की है।

    लगभग 18 वर्ष की आयु में 1955 में सेना में भर्ती हुए । जिला राजोरी के पांजानार गांव में छ: उग्रवादियों के छुपे, होने की खबर मिली। सारे स्थान की घेराबंदी कर ली गई, यद्यपि आरंभिक खोज का कोई विशेष नतीजा न निकला फिर भी घेराबंदी बनाए रखी गई। कुछ समय बाद मौका मिलते ही उग्रवादी घेरा तोड़कर एक नाले की और भागने में सफल हो गए। सुबेदार नैन सिंह ने उनका पीछा करने में कोई समय नहीं गंवाया, भागते हुए उग्रवादियों की और अपनी लाईटमशीन गन को संभालते हुए पोजीशन ले ली। उनके भागने के सभी रास्ते बंद कर दिए, उग्रवादियों ने उनकी पार्टी पर जोरदार फायरिंग शुरु कर दी जिसकी लपेट में आकर एक NCO ज़ख़्मी हो गया खतरे की परवाह न करते हुए नैन सिंह बरसती गोलियों के बीच रेंगता हुए गए और NCO को सुरक्षित स्थान पर पहुँचाने में सफल हुए।इस सारी कारवाई के दौरान वो दुश्मन की गोली से बहुत ज़ख़्मी हो गऐ फिर भी वो रेंगते हुए उग्रवादियों के पास पहुंचे और उनपर ग्रनेड से हमला किया और गोलियों की बौछार भी कर दी एक उग्रवादी मौके पर ही मारा गया जबकि दूसरे ज़ख़्मी उग्रवादी ने नैन सिंह के सिर पर गोली दाग दी, प्राण त्यागने से पहले दूसरे उग्रवादी को भी उन्होने ढेर कर दिया। नैन सिंह को उनकी शूर वीरता के कारण कईं अवार्ड भी मिले इनमें से सबसे बड़े पदक शौर्य चक्र से 15 अगस्त 2001 को मरणो उपरान्त सम्मानित किया गया।

    फिर कवि ने उनकी शान में कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार लिखी…..

    वाह रे नैन,.वाह रे नैन

    याद शहादत तेरी कर भर आते नैन, भर आते नैन

    अपना सुख चैन लुटा के तूने,औरन को दिया सुख चैन

    वाह रे नैन, वाह रे नैन

    परिवार देश का करके ध्यान,संझोए थे सपने बहुत तेरे

    करेंगे साकार उन सपनों को, सुन बच्चे तेरे

    भर लेना गर तू भी चाहे, खुशी से अपने नैन,

    वाह रे नैन, वाह रे नैन !

    नैन सिंह का परिवार वर्तमान में सैनिक कालोनी का निवासी है। कैसा सौभाग्य है कि सैनिक कालोनी की धरती ऐसेवीर योद्धाओं से जुड़ी है।

    जय हिन्द !