कौन सा है मेरा घर Kamini Gupta द्वारा महिला विशेष में हिंदी पीडीएफ

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कौन सा है मेरा घर

कौन सा है मेरा घर

रजनी रह रहकर यही सोचती थी आखिर कौन सा है मेरा घर, वह घर यहां मैने जन्म तो लिया है मगर वो मुझे मेरे बच्चों को सारी ज़िन्दगी सँभाल नहीं सकते या वो घर यहां वो ब्याह कर आई तो थी उसे अपना बनाने मगर पति की मौत के बाद वो भी उसे अपनाना नही चाहते थे

मानस की अकस्मात मौत के बाद मानो रजनी की ज़िन्दगी पल मे ही बिखर गई हो, दो छोटे बेटों की ज़िम्मेदारी उसका अपना अस्ति्तव सब जैसे थम सा गया हो | रजनी के ऊपर तो मानो दुखो का सैलाब सा गया हो | मायके और ससुराल से भी उसे कहीं से भी कोई सहयोग ना होने की वजह से वो एकदम टूट सी गई थी |

मायके मे भी हालात कुछ बेहाल थे पिता के देहांत के बाद घर का खर्च मुशकिल से ही चल रहा था | दोनो भाई अच्छे से अभी काम पर नहीं लग पाए थे, जिसकी वजह से उम्र बड़ती जा रही थी मगर कहीं कोई ऱिशता नहीं हो पा रहा था | रजनी की ज़िन्दगी ही खुशहाल थी जिसे देखकर ही मां को कहीं कुछ हद तक संतोष था | मगर अब तो वो बिल्कुल हताष हो चुकी थीं उनका तो मानो भग्वान पर से विशवास ही उठ गया था | ससुराल मे भी मानस का छोटा भाई इतना नहीं कमाता था कि अच्छे से सारे घर चल पाता यहां तक कि अपने खराब व्यवहार के कारण उसकी पत्नि भी उसे छोड़कर जा चुकी थी | एक शादीशुदा बहन थी मगर उसका भी कोई सहारा नहीं था | रजनी को दूर दूर तक कोई उम्मीद की किरण नज़र नहीं रही थी | बस मानस की एक दुकान थी जिसका काम तो अच्छा था मगर वो भी रजनी की सास के नाम थी जो रजनी को बिल्कुल पसन्द नहीं करती थीं | रजनी की सास तो पहले से ही रजनी और मानस के साथ अच्छा व्यवहार नहीं करती थीं उनके साथ जाने किस जन्म का बैर था उनका | अब तो रजनी अकेली रह गई थी कदम कदम पर हमसाया बनकर साथ देने वाला पति भी उसे छोड़कर जा चुका था | मानस के सहारे ही तो रजनी ने अपनी ससुराल मे बारह साल व्यतीत किए थे मगर अब तो बारह दिन भी उसके लिए काटना मुशकिल हो रहा था | मानस का सहारा भी उससे छीन गया था | कहते हैं कभी कभी मुसिबत चारों ओर से आती है रजनी के साथ भी ऐसा ही हो रहा था | अभी चार दिन ही हुए थे मानस के देहान्त को कि ससुराल वालों ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया | तानो की बौछार का तो सामना करना ही था उसे साथ ही अपने बच्चों को भी सँभालना था | देवर ने भी अपनी असलियत दिखानी शुरू कर दी थी | वो तो जैसे रजनी से उसके पति की दुकान जो उसके जीने की उसके बच्चों के सुरक्षित भविष्य की आस थी उसे भी हड़पना चाहता था | उसके ससुराल वाले चाहते थे कि रजनी सारी ज़िन्दगी उनकी मौताज बनी रहे | रजनी हालात को और अपनी मुसिबतों को भाँप चुकी थी | रजनी ने अपने आँसुओं के सैलाब को थामकर अपने बच्चों के लिए हिम्मत जुटाई और किसी के तानो की परवाह किए बिना अपने पति की दुकान पर जा बैठी | सास और देवर की धमकियां लगातार हावी थी मगर जब बात एक माँ पर आती है तो वो अपने बच्चों के लिए हर इम्तिहान से गुज़र जाती है | रजनी भी तानो बानो के बीच अपनी दिनचर्या व्यतीत करने लगी थी | कभी कभी तो ससुराल मे उसे घर छोड़ने के लिए भी कहा जाता | रजनी रह रहकर यही सोचती आखिर कौन सा है मेरा घर, वह घर यहां मैने जन्म तो लिया है मगर वो मेरे बच्चो को सारी ज़िन्दगी नहीं सँभाल नहीं सकते या वो घर यहां वो ब्याह के तो आई थी उसे अपना बनाने मगर पति की मौत के बाद वह भी उसे अपनाना नहीं चाहते थे | रजनी ने तो बहुत सपनो के साथ ससुराल मे प्रवेश किया था वह तो खुशियां बांटने और उनके दुख कम करना चाहती थी मगर यह नहीं जानती थी कि वो घर भी उसका तब तक जब तक कि उसका पति उसके साथ था या ससुराल वाले उसके पक्ष में हैं | ज़िन्दगी के कितने ही कटु सत्य रजनी ने एक साथ समझे थे कि आधुनिक सोच या कानुन की कितनी ही सुविधाओं के बाद भी सच्चाई बहुत ही कड़वी है एक लड़की का घर कौन सा होता है किसे वह हक से अपना घर कह सकती थी पति का या माता पिता का | रजनी को तो सवालो के जबाब भी खोजने थे और सँघर्ष भी करना था अपने अस्तित्व के लिए अपने बच्चो के भविष्य के लिए जो वो करने लगी थी और वो अब पीछे हटने वालों मे से नहीं थी | हार मानकर भी वो नहीं बैठी उसकी इस सँघर्ष की जंग मे उसके बेटे और उसका आत्मविशवास साथ था | बेशक उसका बड़ा बेटा अभी छठी कक्षा मे था मगर वो भी हर बात समझता था और माँ के साथ कदम मिलाकर चलनो को तैयार था | इति

कामनी गुप्ता

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