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#KAVYOTSAV_2 status in Hindi, Gujarati, Marathi

  • #kavyotsav_2
    #मन -का-अभिलाषा
    चाहता हूँ कभी उड़ना आसमा पे
    पंक्षियों की तरह बाहें फैला के
    चाहता हूँ कभी समुद्र के लहरों को
    उतार लू मन के कैमरों में
    चाहता हूँ करूँ बातें प्रेम का
    प्रेमिका संग उन चांदनी रातों में
    चाहता हूँ कभी बन जाऊं बच्चा
    खेलूँ सारे खेल बचंपन के
    चाहत हूँ कभी बनकर बुजुर्ग
    बयां करू उनके अनुभव और दर्द
    चाहता हूँ कभी बन जाऊं नदी
    और मै प्रकृति का सैर करता चलू
    चाहता हूँ कभी बनकर वृक्ष
    फल और छाया दू सबको फ्री
    चाहता हूँ कभी बन जाऊं उनकी आंख़े
    जो देख न पाये है दुनिया को कभी
    है ऐसी ही कई चाहते
    जो है छिपी स्मृतियों के पीछे
    हटा उन स्मृतियों के घने धुंध
    उसमे लगा मन रूपी पंख
    जीवन के हर गलियों में
    बनकर एक अनुभवी शिक्षक सा
    अवलोकन करना चाहता हूँ
    शायद मैं यही सब चाहता हूँ।।!!

  • #kavyotsav_2
    #शायद_तुमको_मुझसे_प्यार_था
    शायद तुमको मुझसे प्यार था
    तू कालेज आया करती थी
    मुझे सिलेबस सा पढ़ने के लिए
    यूँ साइड वाले बेंच पर बैठकर
    मुझे एकटक देखते रहना
    मुझे चुप बैठे देखकर
    यूँ ही मुझसे बाते करना
    ये सब क्या था?
    शायद तुमको मुझसे प्यार था

    मुझे केंटीन में ले जाने की जिद
    लाइब्रेरी में पढ़ने की जिद
    आकर चुपके से आँखों का ढकना
    कितना पढ़ा मुझे भी बता दे
    यही तेरी कोशिश रहता था
    यह सब क्या था?
    शायद तुमको मुझसे प्यार था

    आया करती थी मेरे पीछे-पीछे
    अपने सहेलियों के साथ बस स्टैंड तक
    बस में चढ़ना ,जाते हुए बॉय बोलना
    सी यू सून के साथ कल आने का वादा करना
    ये सब क्या था?
    शायद तुमको मुझसे प्यार था

    अब भी आती है तू
    मेरे साथ-साथ बस स्टैंड तक
    बस मतलब थोड़ा बदल गया है
    पहले सच में आया करती थी
    अब खवाबों में आती हो
    मैं भी तुम्हे यूँ ही नजर मिलाया करता था
    तेरी बातो में मै भी खो जाया करता था
    मेरे दिल में भी तेरा तस्वीर बस गया था
    ये सब क्या था?
    शायद मुझकों भी तुमसे प्यार था।।

  • #kavyotsav_2
    शहर गये थे क्या लाये हो?
    पूछ रहा है गाँव मेरा
    बगिया के हर पेड़ ओ जिस पर
    उछल-कूद किया करते थे
    अपने दोस्तों के साथ तू
    हर खेल जो यहाँ खेला करते थे
    बच्चपन तो अच्छा था तेरा
    जवानी कैसे काटे हो?
    शहर गये थे क्या लाये हो?
    पूछ रहा है गाँव मेरा
    पहले बहुत निर्भीक लगते थे
    आज खुद से ही डरे-डरे क्यों हो?
    उदासी के घने जाल में
    आज इतना जकड़े क्यों हो?
    हममें अभाव थी हर वस्तु की
    शहर में शायद सब कुछ वह पाये हों
    शहर गये थे क्या लाये हो?
    पूछ रहा है गावँ मेरा
    प्राचीनता थी गावँ की सभ्यता
    आधुनिकता शायद तुम लाये हो
    गिल्ली-डंडा, क्रिकेट खेलते थे
    अब भावनाओं से खेलने आये हो
    इतना सब कुछ अच्छा था तो
    क्यों शहर छोड़ गावँ आयें हो?
    शहर गये थे क्या लाये हों??
    सब समझ रहा है गावँ मेरा

  • #kavyotsav_2

    “ मै खुश हूँ ...पर ...”

    मै खुश हूँ की मेरी 150 वी जन्मजयंति मनाई जा रही है,
    भूल जाने से बहेतर है, इसतरह याद तो बनाई जा रही है .

    मै खुश हु की मेरी हंसती फोटो, नोट पर दिखाई दे रही है,
    गलत कामोंमें ही सही, पर कहीं चलायी तो जा रही है

    मै खुश हु की मेरे नामकी सड़कें बनाई जा रही है
    रुक जाने से बहेतर है, कही न कही तो जा रही है

    मै खुश हूँ की चौराहोंके बीच, मेरी मूर्तियाँ खड़ी की गई है
    पथ्थरसी जडवत ही सही, बीच सडक पर, मेरी पहेचान तो बनी रही है.

    मै खुश हूँ की सरकारी दफ्तरों व न्यायालयमें मेरी तसवीर टंगी है
    तसवीरमें ही सही, निर्जीव, गुमसुम न्यायकी नियत तो दिख रही है

    मै खुश हूँ की तरह तरह के मिडियामें, मेरे मूल्यों और प्रदानकी चर्चायें करी जा रही है
    आचरणमें ना ही सही, मेरे जीवन और संदेशकी पुष्टिकी औपचारिकता तो की जा रही है.

    मै खुश हूँ की “वैष्णव जन तो तेने रे कहिये’ की प्रार्थनाएँ गाई जा रही है
    समजमें और पालनमें ना ही सही, मेरे व्रतोंको पुकार तो दी जा रही है

    मैं खुश हु की, आश्रम और स्मारक भवनमें, कई प्रकारकी प्रदर्शनी रखी गई है
    देशवासियोंके दिलमें ना ही सही, कांचकी बंध अलमारियोंमें दर्शन तो दे रही है

    बस खोज रहा हु एकसो पचास सालों से,
    मैंने जो कहा था “मेरा जीवन ही मेरा संदेश है”
    पर यह कहीं कुछ गलती से आचरणमें क्यों नही है ?

    पर मुजे क्या ? मैं कहाँ जीवित हु ? मैं तो मर चूका हु ..
    मेरी तो हत्या हो चुकी है ... हत्या ...

    तीन ही गोली थी वह ...जो देह का नाश कर गयी ..
    हत्या तो अब हो रही है मेरी, भ्रष्टाचार, जात-पांत, हिंसा, करचोरी जैसी .... कई गोलियों से
    हररोज ... फिर भी ...
    मै खुश हूं की मेरी 150 वी जन्मजयंति मनाई जा रही है,
    भूल जाने से बहेतर है, इसतरह याद तो बनाई जा रही है.

  • #kavyotsav_2
    #तुम_साँस_बनकर_आती_हो

    तू साँस बनकर आती हो
    जिंदगी बन जाती हो
    याद बनकर आती हो
    हर लम्हा क्यों तड़पाती हो

    तुम साँस बनकर आती हो
    जिंदगी बन जाती हो

    तुम छाँव में फिर धुप में
    तुम छाँव बनकर आती हो
    तुम ओस की बून्द वह हो
    हाथ जो ना आती हो
    मन की गलियों में घूमकर
    पलको से नींद चुराती हो

    तुम साँस बनकर आती हो
    जिंदगी बन जाती हो।

    आ बैठ जाती सामने यूँ
    दीद तेरा करता रहूं
    तेरे अधरों की लाली से
    मन तृप्त मैं करता रहूँ
    तेरे ज़ुल्फो की उन घेरों में
    बस यूँ ही मैं उलझा रहूं
    ऐसे ही तुम मेरे खाव्ब में
    रूबरू हो जाती हो

    तुम साँस बनकर आती हो
    जिंदगी बन जाती हो
    याद बनकर आती हो
    हर लम्हा क्यों तड़पाती हो!!

  • #kavyotsav_2

    #बहुत दिनों बाद#
    बहुत दिनों बाद
    देखा है
    उगते हुए सूर्य की
    शीतल किरणों को
    पंछियो के मधुर
    संगीत को
    ओस से भींगी
    घास को
    जाने क्यों नंगे पैर
    चलने को तैयार हुआ इनपर
    बर्षो बाद
    बहुत दिनों के बाद
    आज अलार्म घड़ी नही
    बाबा ने जगाया है मुझे
    अपने पुराने कड़े आवाज में
    जिसमे ना की गुंजाइश नही
    सोते नही देर तक
    बुला अपने पास बहुत समझाया है
    सुनके फिर वह पुरानी बात
    मन में ताजगी आयी है
    बहुत दिनों के बाद
    मेरे पसन्द का खाना
    माँ ने आज बनाया हैं
    जल्दी आ जा नहाके
    अंदर से आवाज लगाया है
    माँ है खुस बहुत
    बेटे को जो खिलाया
    बहुत दिनों के बाद

    देखा हूं
    डूबते सूर्य की
    अस्त-ब्यस्त किरणों को
    जो पड़ रही है पेड़ो के पत्तो
    और चिड़ियों के घोसलों पर
    जिसमे लौट रही है पंक्षीया
    आराम के लिये
    आज मैंने देखा है इनको
    बहुत दिनों के बाद

    पाकर शीतल हवा
    मन को सुकून मिला है
    अपनापन का भाव
    मन को ताजा किया है
    तोड़ अकेलापन
    दोस्तों से बात करने का समय मिला है
    बहुत दिनों के बाद

  • #kavyotsav_2
    मेरा जीत ही मेरा हार बन गया

    आँखों में भविष्य का कुछ सपना सजाया था
    उन सपनों के लिये दिन क्या रात भी गवांया था
    पल हरपल जिया उसी के लिए ही जिया
    जीत के शिखर पर पहुँच कर भी दुखी था
    मेरे साथ की साथी की हार हो गयी थी
    उसकी हार मेरे जीत को तार -तार कर गया

    मेरा जीत ही आखिर मेरा हार बन गया

    मंजिल में पग पग तू मेरे साथ चला था
    तू मुझे मैं तुझे कही गहराई से समझा था
    साथ पढ़ना ,बैठना और घूमना साथ था
    गम और खुसी की बाते तेरा मेरे साथ था
    अब तेरा हार मुझकों धीरे से गुनहगार कह रहा था
    शायद मैं ही तेरे साथ छल का व्यापार कर गया

    मेरा जीत ही आखिर मेरा हार बन गया

    तेरी याद अब मज़रूह मुझे करता है
    तेरे साथ होने का अब भी दिल मेरा दावा करता है
    मेरी गलती थी अब आकर जो सजा तू दे
    कुछ बोल मेरे दोस्त यूँ ना चुपचाप रह
    सच,तेरी हार मेरे जीत को शर्मसार कर गया

    मेरा जित ही आखिर मेरा हार बन गया