हिन्दी एम.ए., बी.एड.। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित होती हैं। कुकिंग, चित्रकारी, कविता व कहानी लेखन, संगीत आदि में रुचि । 16 वर्ष तक हिन्दी अध्यापिका का कार्य भी कर चुकी हूँ।

Archana Singh मातृभारती सत्यापित कोट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी कविता
5 महीना पहले

🌷✍😊
बिनाई- दृष्टि,नज़र 

 न दोष दे मेरी बिनाई को, नफरत में भी तलाश लेती मोहब्बत 

क्या करूँ बेदर्द दिल का, बेरुखी में भी नज़र आ जाती चाहत।

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Archana Singh मातृभारती सत्यापित कोट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी कविता
6 महीना पहले

🌹🙏🌹 भावभीनी श्रद्धांजलि

अनंत पथ को प्रस्थान कर चलीं, संगीत जगत कर सूना वो

वतन रहेगा ऋणी सदा ही, गीत-संगीत को सजा गईं जो।

आना होगा दीदी फिर तुमको, इस माँ भारती के प्रांगण में, 

आशीष की चाहत लिए, स्नेह नयन बिछाए होंगे धरती पे। 

शीतल-निर्मल-कोमल-पाक व्यक्तित्व रहा संगीत साम्राज्ञी का,

'भारत रत्न' से हुईं सम्मानित,मिले फाल्के-पद्म विभूषण पुरस्कार।

वाणी में मधुरता, मीठी मुस्कान,गले में माँ सरस्वती का वास

दयाभाव सी मोहिनी मूरत जैसे कि कोई देवी ली हो अवतार।

शांत गंभीर चिर निद्रा में सो गईं, हमें दे कर नवरसों में गान,

गीत-संगीत की खातिर कर गईं, अपना सम्पूर्ण जीवन दान। 

सुरों से रहा गहरा नाता जिनका, सुरीली आवाज बनी पहचान     

 सरगम की ही करती थी आराधना, कंठ में जादू बेमिसाल। 

स्वर्णिम स्वर को भावभीनी श्रद्धांजलि में किए पुष्प नमन, 

 सरस्वती की देवी को याद कर, सदा होगी सबकी आँखें नम।
🙏🌺🙏

* अर्चना सिंह 'जया'
 

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🌷✍ सुप्रभात 🙏

मानव की स्पृहा थमने को नहीं आती,

विकृत स्वरूप अभिलाषा की हो जाती।

लोभ-लालच की मायानगरी जग सारा,

जीवन पथ से सुख शांति भी ले जाती।

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Archana Singh मातृभारती सत्यापित कोट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी सुविचार
7 महीना पहले

🙏🌷✍

बुद्धिविवेक प्रतिपल उसकी हो रही न्यून,

दान-दया से परे लोभ-लालच में जकड़।

मानव मन बड़ा ही अख्ज़ आता नज़र,

सिर्फ पाने की चाहत ही रखी है जकड़ ।

🌷✍


सड़ी गली वस्तुओं से ही मा़त्र, नहीं आती है यहाँ चरायंध। 

गर दूषित हो सोच विचार, तो इत्र से भी नहीं जाती दुर्गंध।

* अर्चना सिंह जया

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Archana Singh मातृभारती सत्यापित कोट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी कविता
8 महीना पहले

🥳🙂✍

जीवन की आपाधापी में,

अब कुछ पल ठहर जरा,

रोजी रोटी की तलाश में,

गुज़र गया ताउम्र यहाँ।

कभी तो खुशियों की चादर बुन जरा,

खुद की खातिर भी जी ले जरा।

बचपन को न जी पाया ,

ना बालपन का आनंद लिया।

पल-पल गुज़रा जीवन,

यौवन भी दस्तक दे निकल गया।

परिवार-बच्चों के कशमकश में,

बुढ़ापे के आना मुमकिन हुआ।

हाथ, पैर और आँखें कमज़ोर,

 तन-मन अन्ततः व्यथित हुआ। 

पर दिल है अब भी यह कहता,

खुद की खातिर भी कभी

 'बालपन' को दे आवाज जरा।

 अल्हड़ बचपन न ठहरा है कभी,

न ठहरेगा पल भर यहाँ।

थाम हाथ संगी साथी का,

 प्रातःकालीन सफर पर निकल जरा।

उगते सूरज,मंद पवन-पक्षी के कलरव संग, 

बाग बगीचे व तितलियों के संग,

नदियों की कल-कल सुन जरा।

कागज की कश्ती, गिल्ली डंडे, 

ले कंचे का आनंद व थाम पतंग की डोर जरा।

पल-पल को ले थाम यहाँ,

लम्हा-लम्हा है सरक रहा, 

जीवन है सफर मंजिल कहाँ?

मौज मस्ती के कई रंग यहाँ।

जीवन को देकर अल्पविराम,

शौक इच्छाओं में अब रंग भर जरा।

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Archana Singh मातृभारती सत्यापित कोट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी सुविचार
8 महीना पहले

सुप्रभात 🙏🎊💐

हाँका- ललकार 

जनता-जनार्दन को लगा हाँका, त्याग मौन अब तो बोल।
बहन-बेटी तेरी भी हो सकती,अपराध में मजहब न खोज।
🌷✍
तीरगी- अंधकार 

तीरगी से न घबराना मानव,मन में दीप जलाए रखना।
वक्त का कोहरा है बस, हौसले-परिश्रम से हार जाएगा।

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Archana Singh मातृभारती सत्यापित कोट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी कविता
10 महीना पहले

🌷✍

खूबसूरती सदा मन की अच्छी होती, 

जो आँखों में, पल में नज़र आ जाती।

तन की सुन्दरता तो सदा नहीं रहती, 

विचार की जमाल, रहती सदा कायम।

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Archana Singh मातृभारती सत्यापित कोट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी कविता
10 महीना पहले

🌺✍🙏
गुलाब से सीखा स्मित बनाए रखना, 
काँटों संग रहकर भी खुशियाँ बिखेरना।
बहुत ही अनमोल भेंट है मुस्कान, 
बाजारों में नहीं स्मित-सा कोई सामान।

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Archana Singh मातृभारती सत्यापित कोट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी विचार
11 महीना पहले

🌺✍
वो मानव ही क्या है, जिसमें इश्फ़ाक नहीं,

पशु मानव से बेहतर है, जिसमें स्वार्थ नहीं।

लहू न बन जाए पानी, मानवता विचार सही,

इश्फ़ाक पहचान मानव की, कि वो मृत नहीं।

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Archana Singh मातृभारती सत्यापित कोट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी सुविचार
11 महीना पहले

सुप्रभात 🌺🙏

हम सबका वो मुंसिफ,भेदभाव नहीं करता,

समदृष्टि रखता सब पर, प्रभु न्याय है करता।

न कोई छोटा, न कोई बड़ा उसकी जगत में,

बे आवाज होती लाठी, मुंसिफ के जवाब में।

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