हिन्दी एम.ए., बी.एड.। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित होती हैं। कुकिंग, चित्रकारी, कविता व कहानी लेखन, संगीत आदि में रुचि । 16 वर्ष तक हिन्दी अध्यापिका का कार्य भी कर चुकी हूँ।

सुप्रभात 🙏🌸

हाथों में लेकर हमारा हाथ,
संग-संग चले थे, कुछ दूर साथ,
दोनों के मिलते थे, कुछ ख्यालात।
पर मुझे क्या खबर थी कि
यह दिल की लगी नहीं,
तुम्हारी दिल लगी थी जनाब।

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Archana Singh कोट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी कविता
3 महीना पहले

सुप्रभात 🙏🌸✍️ 'मुझे तुम्हारा प्रस्ताव स्वीकार है'

मुझे तुम्हारा प्रस्ताव स्वीकार है,

फिर भी तुम्हें न जाने क्यूं

अपनी मोहब्बत से इंकार है।

न चाहते हुए भी स्वदेश से हुई दूर ।

जिंदगी दी थी जिन्होंने,

उन्हें ही छोड़ने को हुई मजबूर।

मुझे तुम्हारा हर प्रस्ताव स्वीकार है।

जिस आत्मनिर्भरता को देख हुए थे अभिभूत

नृत्य कला को छोड़ने को हो गई तैयार।

दफ़न कर दिया अपनी आकांक्षाओं को,

चल दी साथ तुम्हारे, अपने दिल को थाम।

तुम्हारे स्वप्नों में भरने लगी रंग,

खुद के परों को समेटे हुए, हुई तुम्हारे संग।

अब बहुत निभा ली कसमें वादे,

बेटी को जन्म देकर उसकी बनूंगी आभारी।

माना चाहत तुम्हें थी बेटे की,

पर मां बनने की वर्षों से थी चाहत हमारी।

जन्म से पूर्व ही नहीं कर सकती हत्या,

तुम क्या जानो इक औरत की व्यथा।

इक दिवानगी वो थी कभी तुम्हारी,

हाथों में लिए फूल बारिश में भी आते थे।

और इक दिवानगी ये कैसी कि

कांटे चुभा हमें बेबस- बेघर किए।

आज तुम्हारे इस प्रस्ताव से मुझे इंकार है,

मेरी मोहब्बत नहीं है कमज़ोरी।

बस किस्मत से लड़ कर जीतने की,

कुछ आदत सदा रही है पुरानी।

अब मैं नहीं दोहरा पाऊंगी कि

'मुझे तुम्हारा हर प्रस्ताव स्वीकार है।' ....... .... अर्चना सिंह जया
( मेरी स्वरचित सम्मानित व पुरुस्कृत रचना।)

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Archana Singh कोट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी कविता
4 महीना पहले

किसको जिम्मेदार कहोगे-- कविता

कल भी औरों को दोष देते थे,

आज भी दोष मढ़ोगे।

यथार्थ को जो बूझोगे,

किसको जिम्मेदार कहोगे?

क्या वक्त को जिम्मेदार कहोगे?

प्रतिदिन प्रयास करना है,

नित आगे ही बढ़ना है।

भूमि से हैं जुड़े, मेहनत करना है।

माना वक्त कठिन है सबके लिए

इससे नहीं डरना है।

अंतर्मन के द्वंद्व से स्वयं ही,

हमें उभरना है।

जो कभी आत्मचिंतन करोगे,

फिर किसे, कैसे और

किसको जिम्मेदार कहोगे?

मानवता के परीक्षा की है घड़ी

बेरोजगारी,गरीबी और

प्राकृतिक आपदा संग,

मानव की जंग है छिड़ी।

विजय- पराजय से हो भयभीत

किस पक्ष में खड़े रहोगे?

किसको जिम्मेदार कहोगे?

आज समय आया है देखो

खुद के हुनर को संवारने का

गुजरते इस दौर को,

इक अवसर में बदलने का।

मिल कर हाथ बढ़ा तू साथी

दोष-प्रदोष का खेल समाप्त कर,

एक जुट हो अग्रसर होना है,

गंभीरता से इस पर विचार कर।

'कोरोना' ने रचा चक्रव्यूह है ऐसा

शायद यह मानव कुछ समझेगा।

स्वयं से विचार जो करोगे,

फिर किसको जिम्मेदार कहोगे?

क्या वक्त को जिम्मेदार कहोगे?
---------- अर्चना सिंह जया

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5 महीना पहले

🌸🙏🌸

राम लला के गीत गाओ री
जय राम,श्री राम में रम जाओ री।

सरयू तट पर हुई भीड़ भारी,
धन्य हुई है अवध हमारी,
ईंट ईंट राम की है आभारी
झूम रहे बच्चे, बूढ़े, नर-नारी,
माटी माटी से आवाज आई
बस 'राम नाम है सुखदाई।'

राम लला के गीत गाओ री।
जय राम,श्री राम में रम जाओ री।

भूमि पूजन,पुष्प,तिलक कर
राम, राम की जयकार लगा।
राम नाम ही है सत्य साईं,
रोम रोम में राम समायी,
तीन अक्षर में जग रमायी,
परम आनंद इस नाम में भाई।

राम लला के गीत गाओ री।
जय राम,श्री राम में रम जाओ री।

भक्ति रस में डूबी नगरी सारी,
सियाराम की छवि लागे प्यारी।
राम धुनी तन मन में रमाई।
धन्य-धन्य हुए अवध बिहारी।।
धरती अंबर में है गुंजायमान,
तन मन में रम गए सियाराम।

राम लला के गीत गाओ री।
जय राम,श्री राम में रम जाओ री।

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वक्त का खेल

कितने मजबूर हो गए हम,
पास होकर भी दूर हो गए हम।
बीत गई 'होली' बस यूं ही,
न चढ़ा रंग प्रेम का सोचो।
दूरियां बढ़ा ली मानव ने,
वक्त ने रचा खेल है देखो।
'कोरोना' ने ज़िद कर ठानी,
इस दफा झुकेगा अहम तुम्हारा।
मानव को नया सबक मिलेगा,
प्रेम, विछोह को शायद समझेगा।
'ईद पर्व' भी कुछ इस तरह मनाई,
घर पर ही नमाज़ अदा कर,
खीर-पकवान की थाल सजाई।
बंद दीवारों में थोड़ी रौनक आई।
दूजा पर्व आ गया अनोखा,
बहन-भाई का स्नेह बंधन ऐसा,
डोरी,रोली व चंदन के जैसा।
पर इस वर्ष में किसने था सोचा
राखी बेबस पड़ी थाल में,
इंतजार की घड़ी हुई है लंबी।
जाने कब महामारी छटेगी?
एक जुट हो त्योहार करेंगे,
मिलकर हम सब फिर झूमेंगे।
वक्त की मार से जो मानव सीखे,
स्नेह,प्रेम संग से गर रहना सीखें।

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🙏🌧️☔
सावन मन भावन है।
बरखा की बूंदों में,
शीतल पवन के झोंंकों में,
बादलों के घेरों में,
कोयल के गीतों में,
सावन मन भावन है।
अमिया के झूलों पे,
नदियों के उफान पे,
खेतों की हरियाली पे,
मेहंदी हथेली पे,
सावन मन भावन है।
सखियों की टोली संग,
धानी चुनरी के संग,
खनकती चूड़ियों संग,
छतरी हमजोली संग,
सावन मन भावन है।

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Archana Singh कोट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी कविता
6 महीना पहले

कविता ✍️ मुझे यकीन है

मुझे यकीन है
तुम इक दिन समझोगे।
जब आॅंखें कमज़ोर हो जाएॅंगी,
मन का कोना खाली हो जाएगा,
आॅंगन भी सूना हो कोसेगा,
दीवारों में दरारें दिखेंगी,
मुस्कान मेरी तुम खोजोगे।
मुझे यकीन है
तुम इक दिन समझोगे।
गुजरा वक्त याद आएगा,
तन्हा पहर भी ढल जाएगा,
गुलाबी शाम फिर रुलाएगी,
बस धुॅंधली होंगी यादें पुरानी,
आॅंसुओं से होंगी पलकें गीलीं।
मुझे यकीन है।
तुम इक दिन समझोगे,
पुरानी तस्वीरों में ढूॅंढोगे,
रंगोली के रंगों में खोजोगे,
गलियारों सड़को पर
तन्हाॅं गुम हो भटकोगे।
भीड़ में भी रहोगे अकेला
फिर मेरी मोहब्बत को तरसोगे।
मुझे यकीन है।
........ अर्चना सिंह जया

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✍️😃
उन्नीस बीस का अंतर
इस वर्ष ने अच्छे से समझाया।
छोटे-बड़े झटके रह-रह
जीवन को महसूस है कराया।

🙏🌸
कुछ नहीं रखा है 'मैं' में
खाली हाथ लौटना है वहां।
सफ़र है जिंदगी, मंजिल नहीं
जी ले इक-इक पल यहां।

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Archana Singh कोट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी कविता
7 महीना पहले

🙏✍️🌸
मायानगरी है ये दुनिया ही
नकाब पहना है सबने यहां।
उम्दा कलाकार हैं हमसभी
सच से चुराकर आंखें देखो,
कृत्रिम जीवनशैली को
समझ बैठे हैं वास्तविक जहां।
यथार्थ से होकर दूर हम
भटक गई हैं राहें कहीं।
औरों की झूठी तसल्ली के लिए
खुद को गिरवी रखते हैं सभी।
'मकान बहुत ही सुन्दर है'-
ऐसा सभी कहते हैं यहां।
दीवारों पर लगी पेंटिंग,
रंग बिरंगी टंगी तस्वीरें
खूबसूरती को हैं बढ़ाते।
पर मन एक कोना फिर भी
रह जाता खाली कहीं यहां।
इसे सजाएं कैसे, कहो अब
खुशियां, ठहाके,रिश्ते,प्यार
सहज मिलते नहीं बाजारों में।
हां, दर्द को छुपाया मुस्कानों से
तनहाई को सजाया गीतों से
ऊंचाई को छूने की चाहत ने
साथ छुड़ाया अपनों से।
सौहरत,दौलत, मकान, गाड़ियां
पाकर भी मैं रहा अकेला जहां।
विचित्र है ये दुनिया यारों
सब पाकर भी कभी कभी
खुश नहीं हो पाता मानव यहां।
तलाश खत्म होती नहीं उसकी
खुद को खो देता है वो यहां।
जिंदगी इक पहेली सी
जाने क्यों हरपल लगती यहां?
खुद की खुशी है जरूरी,
न करना खुदकुशी कभी यहां।
.....अर्चना सिंह जया

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🙏😃✍️
सबके प्रिय होने वाले ही मौत के प्यारे भी होते हैं,
दिल में दर्द और होंठों पर मुस्कान सजाए होते हैं।