मेरी इबादतों को ऐसे कर कबूल ऐ मेरे खुदा, के सजदे में मैं झुकूं तो मुझसे जुड़े हर रिश्ते की जिंदगी संवर जाए........ ..खान@

मां 

मामूली एक कलम से कहां तक घसीट लाए
हम इस ग़ज़ल को कोठे से मां तक घसीट लाए
 
लबों पे उसके कभी बद्दुआ नहीं होती
बस एक मां है जो मुझसे ख़फ़ा नहीं होती

किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकां आई
मैं घर में सब से छोटा था मेरे हिस्से में मां आई

इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है
मां बहुत ग़ुस्से में होती है तो रो देती है

दावर-ए-हश्र तुझे मेरी इबादत की कसम
ये मेरा नाम-ए-आमाल इज़ाफी होगा

नेकियां गिनने की नौबत ही नहीं आएगी
मैंने जो मां पर लिखा है, वही काफी होगा।
बहन का प्यार मां की ममता...

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सूखे पत्तों की तरह बिखरे थे हम।
किसी ने समेटा भी तो सिर्फ जलाने के लिए।
@खान।,,

वहम था कि सारा बाग अपना है,
तुंफ़ा के बाद पता चला,
सूखे पत्तों पर भी हक़,
हवा ओ का था।,,
@खान।,,

दिल की धड़कन को धड़का गया कोई
मेरे ख्वाबों को जगा गया कोई
हम तो अनजाने रास्तो पे यूं ही चल रहे थे
अचानक ही प्यार का मतलव भी सीखा गया कोई।
KH@N..

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रेत सा क्युं लगता हैं  प्यार तुम्हारा , 
कभी मिला , तो मुठ्ठीभर तो कभी .
चुटकी भी नसीब नहीं।
@खान।,,

जब जब तुमसे मिलने की उम्मीद नजर आई,
तब तब मेरे पैरों में ज़ंजीर नजर आई,
निकल पड़े इन आँखों से हजारों आँसू,
हर आँसू में आपकी तस्वीर नजर आई।
@खान।,,

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तज़ुर्बा है मेरा मिट्टी की पकड़ मजबुत होती है
संगमरमर पर तो हमने पाँव फिसलते देखे हैं।,,
@खान।,,

कौन कहता है कि दिल सिर्फ सीने में होता है,
तुझको लिखूँ तो मेरी उंगलियाँ भी धड़कती हैं।
@खान।,,

जहा कदर ना हो अपनी वहां जाना फिजूल है,
चाहे किसी का घर 🏠 हो चाहे किसी का दिल ❤,,
KH@N..

मुजे रेत से क्या लेना देना साहिबा,
जहा तू नही वो हर जगह रेगिस्तान है।,,
KH@N..