हिंदी साहित्य में सक्रिय नाम. कवितायेँ, कहानियां, लेख, रिपोर्ट्स, फिल्म समीक्षा आदि का नियमित प्रकाशन. दो कविता-संग्रह, एक कहानी संग्रह, एक लघु उपन्यास प्रकाशित. सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में कवितायेँ, कहानियां, लेख प्रकाशित.

मातृभारती पर मेरी कहानियाँ आप सभी को बहुत पसंद आयीं। इसके लिए तहेदिल से शुक्रिया। मेरे इस उपन्यास 'मन कस्तूरी रे - अधूरे प्रेम की पूरी दास्तान' को भी पाठकों का भरपूर प्यार मिला, इसलिए दिल से आभार। स्नेह बनाये रखिये।
नहीं पढ़ा तो अब जरूर पढ़िये और हाँ मनमौजी लड़की स्वस्ति की ये प्रेम कहानी पसंद आए तो रेटिंग और कमेन्ट देना न भूलें। शुक्रिया

आपकी दोस्त
अंजू शर्मा

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काली चूड़ी
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बहू को काले रंग की साड़ी के साथ चाव से मैचिंग के सुंदर काले कंगन पहनते देख सास ने त्यौरियां चढ़ाते हुए कहा,

"ये क्या बहू? क्या तुम जानती नहीं कि हमारे यहां काली चूड़ी पहनने का रिवाज़ ना है।"

बहू ने यथासंभव विनम्रता घोलते हुए कारण पूछा।

"क्योंकि हमारी सास कहती थीं कि हमारे खानदान में एक औरत जब सती हुई तो काली चूड़ियाँ पहने हुए थी।" सास ने ज्ञान का अथाह प्रदर्शन करते हुए रहस्योद्घाटन किया।

"तो इसका मतलब आपकी सास यानि मेरी दादी सास सारे रीति रिवाज़ मानती थीं?"

"हाँ, बिल्कुल"

"हाआआ.....मतलब आपके परिवार में सती प्रथा का भी रिवाज़ था कभी। पर आपकी सास तो .....और आप भी...मेरा मतलब...ये रिवाज़ तो....."

"अब कुछ रिवाज़ छूट भी जाते हैं बहू।"

"हाँ सही कहा आपने मांजी। लो बताओ कोई तुक है भला। किसी वैद्य हक़ीम डॉक्टर ने थोड़े ही कहा है कि सब रिवाज़ माने जाएं।"

असमंजस में पड़ी सास ने सहमति में सिर हिलाया।

"ह्म्म्म.....तो ये काली चूड़ी न पहननेवाला रिवाज़ भी छूट गया समझिये।"

और फिर कालांतर में इसी तरह सती प्रथा के छूटे रिवाज़ की आड़ में कई बेतुके रिवाज़ छूटते चले गए। आजकल की बहुएं सब की सब पतनशील हैं।

---अंजू शर्मा

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रंग
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वह अक्सर रंगों से घिरी रहती। चटख रंग, दिप-दिप करते रंग, खूब सारे रंग। उसकी पेंटिंग्स में खिलखिलाते, कहकहे लगाते रंग। और वो उदास रंगों में लिपटी उदासी का पैरहन लपेटे, खामोश उन्हें सजाती रहती।

"उँह, 17 साल भी कोई उम्र होती है, उदास सफ़ेद, बोरिंग धूसर, सुबक-सुबक ग्रे और ग़मगीन ऑफ़ वाइट पहनने की। दुनिया कितनी रंगीन है लड़की। रंगों से मुहब्बत करो।"

"पर मेरा सांवला रंग?" उदास लड़की ने धीमे से कहा।

"अल्लाह, ये बड़ी बड़ी आँखें, इनमें झिलमिलाते रंगों से भला कुछ हसीन है। उतार फेंको उदासी की चादर। विदा करो संजीदगी। रंगों को आने दो।"

फिर रंग आये। एक-एककर सारे रंग आये। सुर्ख लाल, शोख नारंगी, खिलता गुलाबी, हरियाला हरा और मन को ठंडक देता नीला। उनसे घबराकर उदासी फाख्ता बन उड़ गई। अवसाद पानी बन बह गया और संजीदगी एक जम्हाई ले लम्बी नींद सो गई।

एक शाम दिल के दरवाज़े पर धीमी सी दस्तक हुई। उसने पूछा, "कौन?"

खुश्बू के झोंके ने कान में फुसफुसाया, "प्रेम"

उस साल वसंत सर्दियों से पहले ही आ गया था।

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