तुम्हे देखा तो ये ख्याल आया, ज़िन्दगी धूप तुम घना साया.....

तुम मिले तो क्यों लगा मुझे,
खुद से मुलाकात हो गयी

कुछ भी तो कहा नहीं मगर,
ज़िन्दगी से बात हो गयी...!

रेत पर नाम कभी लिखते
नहीं....!
रेत पर नाम कभी टिकते
नहीं.....!
लोग कहते है की हम पत्थर
दिल हैं...!
लेकिन पत्थरों पर लिखे नाम
कभी मिटते नहीं।

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निकाल देते हैं दूसरों में ऐब,
जैसे हम नेकियों के नवाब हैं।
गुनाहों पर अपने परदे डालकर,
कहतें हैं ज़माना बड़ा खराब हैं...

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हमें आप की कसम देकर हजारों ने लूटा...

hum bewafa hargiz na the ??

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पता नहीं वो लोग कौन थे जो,
अपने महबूब के लिये पूरी दूनिया
से लड़ जाते थे?

यहां तो महबूब से ही लडाई
खत्म नहीं होती!!
???

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हासिल ए ज़िन्दगी ...
....हसरतों के सिवा कुछ भी नहीं,

ये किया नहीं, वो हुआ नहीं,
ये मिला नहीं, और वो रहा नहीं...!!

बहते अश्कों की ज़ुबान नहीं होती,
लफ्जों में मोहब्बत बयां नहीं होती,
मिले जो प्यार तो कदर करना,
किस्मत हर किसी पर महेरबान नहीं होती....
aaliya

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मेरे दुश्मन भी, मेरे मुरीद हैं शायद
वक़्त बेवक़्त मेरा नाम लिया करते हैं

मेरी गली से गुज़रते हैं छुपा के खंजर,
रू-ब-रू होने पर सालाम किया करते हैं!!

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मेरे महबूब तुम्हें जाने की ज़रुरत क्या थी
जब जाना ही था तो फिर आने की ज़रूरत क्या थी

कितने सुकून में था तेरे आने से पहले
जाते जाते मेर सुकून ले जाने की ज़रूरत क्या थी

तुम्हीं को तो बता रखा था जान मेरी ज़माने को
यूँ जाते जाते मेरी जान ले जाने की भी ज़रूरत क्या थी

अब हो गई हो ना तन्हा, हमारे बगैर यूँ चलते चलते
जब प्यार था ही नहीं,तो जताने की ज़रुरत क्या थी....!

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