Lawyer,Author, Poet, Mob:9990389539 Listen my Poem at:https://www.youtube.com/channel/UCCXmBOy1CTtufEuEMMm6ogQ?view_as=subscriber

Ajay Amitabh Suman verified कोट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी कविता
4 दिन पहले

इस दीर्घ कविता के पिछले भाग अर्थात् चौदहवें भाग में दिखाया गया कि प्रतिशोध की भावना से ग्रस्त होकर अर्जुन द्वारा  जयद्रथ का वध इस तरह से किया गया कि उसका सर धड़ से अलग होकर उसके तपस्वी पिता की गोद में गिरा और उसके तपस्या में लीन पिता का सर टुकड़ों में विभक्त हो गया कविता के वर्तमान प्रकरण  अर्थात् पन्द्रहवें भाग में देखिए महाभारत युद्ध नियमानुसार अगर दो योद्धा आपस में लड़ रहे हो तो कोई तीसरा योद्धा हस्तक्षेप नहीं कर सकता था। जब अर्जुन के शिष्य सात्यकि और भूरिश्रवा के बीच युद्ध चल रहा था और युद्ध में भूरिश्रवा सात्यकि पर भारी पड़ रहा था तब अपने शिष्य सात्यकि की जान बचाने के लिए अर्जुन ने बिना कोई चेतावनी दिए अपने तीक्ष्ण बाण से भूरिश्रवा के हाथ को काट डाला। तत्पश्चात सात्यकि ने भूरिश्रवा का सर धड़ से अलग कर दिया। अगर शिष्य मोह में अर्जुन द्वारा युद्ध के नियमों का उल्लंघन करने को पांडव अनुचित नहीं मानते तो धृतराष्ट्र द्वारा पुत्रमोह में किये गए कुकर्म अनुचित कैसे हो सकते थे ?  प्रस्तुत है दीर्घ कविता "दुर्योधन कब मिट पाया " का पंद्रहवां भाग।

और पढ़े
Ajay Amitabh Suman verified कोट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी कविता
2 सप्ताह पहले

​इस दीर्घ कविता के पिछले भाग अर्थात् तेरहवें भाग में अभिमन्यु के गलत तरीके से किये गए वध में जयद्रथ द्वारा निभाई गई महत्वपूर्ण भूमिका और तदुपरांत केशव और अर्जुन द्वारा अभिमन्यु की मृत्यु का प्रतिशोध लेने के लिए रचे गए प्रपंच के बारे में चर्चा की गई थी। कविता के वर्तमान प्रकरण अर्थात् चौदहवें भाग में देखिए कैसे प्रतिशोध की भावना से वशीभूत होकर अर्जुन ने जयद्रथ का वध इस तरह से किया कि उसका सर धड़ से अलग होकर उसके तपस्वी पिता की गोद में गिरा और उसके पिता का सर टुकड़ों में विभक्त हो गया। प्रतिशोध की भवना से ग्रस्त होकर अगर अर्जुन जयद्रथ के निर्दोष तपस्वी पिता का वध करने में कोई भी संकोच नहीं करता , तो फिर प्रतिशोध की उसी अग्नि में दहकते हुए अश्वत्थामा से जो कुछ भी दुष्कृत्य रचे गए , भला वो अधर्म कैसे हो सकते थे? प्रस्तुत है दीर्घ कविता "दुर्योधन कब मिट पाया " का चौदहवाँ भाग। 
============================
निरपराध थे पिता जयद्रथ के पर  वाण चलाता था,
ध्यान मग्न थे परम तपस्वी पर संधान लगाता था।
प्रभुलीन के चरणों में गिरा कटा हुआ जयद्रथ का सिर ,
देख पुत्र का शीर्ष विक्षेपण पिता हुए थे अति अधीर।
===========================
और भाग्य का खेला ऐसा मस्तक फटा तात का ऐसे,
खरबूजे का फल हाथ से भू पर गिरा हुआ हो जैसे।
छाल प्रपंच जग जाहिर अर्जुन केशव से बल पाता था , 
पूर्ण हुआ प्रतिशोध मान कर चित में मान सजाता था।
============================
गर भ्राता का ह्रदय फाड़ना कृत्य नहीं बुरा होता, 
नरपशु भीम का प्रति शोध रक्त पीकर हीं पूरा होता।
चिर प्रतिशोध की अग्नि जो पांचाली में थी धधक रही ,
रक्त पिपासु चित उसका था शोला बनके भड़क रही। 
============================
ऐसी ज्वाला भड़क रही जबतक ना चीत्कार हुआ, 
दु:शासन का रक्त लगाकर जबतक ना श्रृंगार हुआ।
तबतक केश खुले रखकर शोला बनकर जलती थी ,
यदि धर्म था अगन चित में ले करके जो फलती थी।
=========================
दु:शासन उर रक्त हरने में, जयद्रथ जनक के वधने में ,
केशव अर्जुन ना कुकर्मी गर छल प्रपंच के रचने में।
तो  कैसा  अधर्म  रचा  मैंने वो धर्म स्वीकार किया। ,  
प्रतिशोध की वो अग्नि हीं निज चित्त अंगीकार किया?
==========================
गर प्रतिशोध हीं ले लेने का मतलब धर्म विजय होता ,
चाहे कैसे भी ले लो पर धर्म पुण्य ना क्षय होता। 
गर वैसा दुष्कर्म रचाकर पांडव विजयी कहलाते,
तो किस मुँह से कपटी सारे मुझको कपटी कह पाते?
============================
कविता के अगले भाग अर्थात् पन्द्रहवें भाग में देखिए अश्वत्थामा आगे बताता है कि अर्जुन ने अपने शिष्य सात्यकि के प्राण बचाने के लिए भूरिश्रवा का वध कैसे बिना चेतावनी दिए कर दिया।
=============================
अजय अमिताभ सुमन: सर्वाधिकार सुरक्षित

और पढ़े
Ajay Amitabh Suman verified कोट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी कविता
3 सप्ताह पहले

पिता मेरे गुरु द्रोणाचार्य थे चक्रव्हयू के  अद्भुत ज्ञाता,
शास्त्र शस्त्र गूढ़ ज्ञान के ज्ञानी रणशिल्प के परिज्ञाता।
धर्मराज ना टिक पाते थे भीम नाकुलादि पांडव भ्राता ,
पार्थ  कृष्ण को अभिज्ञान था वो  कैसे संग्राम   विज्ञाता।

इसीलिए  तो  यदुनंदन  ने कुत्सित  मनोव्यापार  किया ,
संग युधिष्ठिर कपट रचा कर प्राणों पे अधिकार किया।
अस्वत्थामा  मृत  हुआ  है   गज  या  नर  कर  उच्चारण,
किस मुँह धर्म का दंभ भरें वो   दे   सत्य  पर सम्भाषण।

धर्मराज का धर्म लुप्त  जब गुरु ने असत्य स्वीकारा था,
और  कहाँ  था  धर्म ज्ञान  जब छल से शीश उतारा था ।
एक  निहथ्थे   गुरु   द्रोण   पर  पापी  करता  था  प्रहार ,
धृष्टद्युम्न  के  अप्कर्मों  पर  हुआ   कौन  सा  धर्माचार ?


अधर्म राह का करके पालन और असत्य का उच्चारण ,
धर्मराज  से  धर्म  लुप्त था  और  कृष्ण  से  सत्य   हरण। 
निज  स्वार्थ   सिद्धि   हेतु पांडव  से जो कुछ  कर्म  हुआ ,
हे कृपाचार्य गुरु द्रोणाचार्य को छलने में क्या धर्म हुआ ?

बगुलाभक्तों के चित में क्या छिपी हुई होती है आशा,
छलिया बुझे जाने  माने किचित छल प्रपंच  की भाषा।
युद्ध  जभी कोई  होता है  एक  विजेता  एक  मरता  है ,
विजय पक्ष की आंकी जाती समर कोई कैसे लड़ता है?

हे  कृपाचार्य  हे  कृतवर्मा  ना  सोंचे  कैसा काम  हुआ ?
हे  दुर्योधन ना अब   देखो ना  युद्धोचित  अंजाम हुआ?
हे  कृतवर्मा  धर्म   रक्षण की    बात हुई  है आज वृथा ,
धर्म न्याय का क्षरण हुआ  है रुदन करती आज पृथा।

गज कोई क्या मगरमच्छ से जल में लड़ सकता है क्या?
जो जल का है चपल खिलाड़ी उनपे अड़ सकता है क्या?
शत्रु  प्रबल  हो   आगे  से  लड़ने  में  ना  बुद्धि का काम , 
रात्रि प्रहर में हीं उल्लू अरिदल का करते काम तमाम।

उल्लूक सा  दौर्वृत्य  रचाकर  ना  मन  में  शर्माता   हूँ , 
कायराणा  कृत्य  हमारा  पर मन हीं मन  मुस्काता हूँ ।  
ये बात सही है छुप छुप के हीं रातों को संहार किया ,
कोई  योद्धा जगा नहीं  था बच  बच के प्रहार किया।

फ़िक्र  नहीं  है  इस  बात की ना  योद्धा  कहलाऊँगा,
दाग  रहेगा  गुरु पुत्र  पे   कायर   सा  फल  पाऊँगा।
इस दुष्कृत्य  को बाद हमारे समय  भला कह पायेगा?
अश्वत्थामा  के चरित्र  को  काल  भला  सह  पायेगा?

जब भी कोई नर या नारी प्रतिशोध का करता  निश्चय ,
बुद्धि लुप्त हो हीं  जाती  है और ज्ञान का होता है क्षय। 
मुझको  याद  करेगा  कोई  कैसे    इस का ज्ञान नहीं ,
प्रतिशोध  तो  ले  हीं  डाला बचा हुआ बस भान यहीं ।

गुरु  द्रोण  ने पांडव को हरने हेतु जब चक्र रचा,
चक्रव्यहू के पहले वृत्त में जयद्रथ ने कुचक्र रचा।
कुचक्र  रचा  था  ऐसा  कि  पांडव  पार ना पाते थे ,
गर  ना  होता जयद्रथ  अभिमन्यु  मार ना पाते थे।  

भीम युधिष्ठिर जयद्रथ पे उस दिन अड़ न पाते थे ,
पार्थ कहीं थे फंसे नहीं सहदेव नकुल लड़ पाते थे।  
अभिमन्यु तो चला गया फंसा हुआ उसके अन्दर ,
वध फला अभिमन्यु का बना जयद्रथ काल कंदर।   

और पढ़े
Ajay Amitabh Suman verified कोट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी कविता
3 सप्ताह पहले

आश्वस्त रहा सिंहों की भाँति गज सा मस्त रहा जीवन में,
तन चींटी से बचा रहा था आज वो ही योद्धा उस क्षण में।
पड़ा हुआ था दुर्योधन होकर वन पशुओं से लाचार,
कभी शिकारी बन वन फिरता आज बना था वो शिकार।

मरना तो सबको होता एक दिन वो बेशक मर जाता,
योद्धा था ये बेहतर होता रण क्षेत्र में अड़ जाता।
या मस्तक कटता उस रण में और देह को देता त्याग ,
या झुलसाता शीश अरि का निकल रही जो उससे आग।

पर वीरोचित एक योद्धा का उसको ना सम्मान मिला ,
कुकर्म रहा फलने को बाकी नहीं शीघ्र परित्राण मिला।
टूट पड़ी थी जंघा उसकी उसने बेबस कर डाला,
मिलना था अपकर्ष फलित सम्मान रहित मृत्यु प्याला।

जंगल के पशु जंगल के घातक नियमों से चलते है,
उन्हें ज्ञात क्या धैर्य प्रतीक्षा गुण जो मानव बसते हैं।
पर जाने क्या पाठ पढ़ाया मानव के उस मांसल तन ने ,
हिंसक सारे बैठ पड़े थे दमन भूख का करके मन में।

सोच रहे सब वन देवी कब निज पहचान कराएगी?
नर के मांसल भोजन का कब तक रसपान कराएगी?
कब तक कैसे इस नर का हम सब भक्षण कर पाएंगे?
कब तक चोटिल घायल बाहु नर रक्षण कर पाएंगे?

पैर हिलाना मुश्किल था अति उठ बैठ ना चल पाता था ,
हाथ उठाना था मुश्किल जो बोया था फल पाता था।
घुप्प अँधेरा नीरव रात्रि में सरक सरक के चलते सांप ,
हौले आहट त्वरित हो रहे यम के वो मद्धम पदचाप।

पर दुर्योधन के जीवन में कुछ पल अभी बचे होंगे ,
या गिद्ध, शृगालों के कति पय दुर्भाग्य रहे होंगे।
गिद्ध, श्वान की ना होनी थी विचलित रह गया व्याधा,
चाह अभी ना फलित हुई ना फलित रहा इरादा।

उल्लू के सम कृत रचा कर महादेव की कृपा पाकर,
कौन आ रहा सन्मुख उसके देखा जख्मी घबड़ाकर?
धर्म पुण्य का संहारक अधर्म अतुलित अगाधा ,
दक्षिण से अवतरित हो रहा था अश्वत्थामा विराधा।

एक हाथ में शस्त्र सजा के दूजे कर नर मुंड लिए,
दिख रहा था अश्वत्थामा जैसे नर्तक तुण्ड जिए।
बोला मित्र दुर्योधन तूझको कैसे गर्वित करता हूँ,
पांडव कपाल सहर्ष तेरे चरणों को अर्पित करता हूँ।

भीम , युधिष्ठिर धर्मयुद्ध ना करते बस छल हीं करते थे ,
नकुल और सहदेव विधर्मी छल से हीं बच कर रहते थे।
जिस पार्थ ने भीष्म पितामह का अनुचित संहार किया,
कर्ण मित्र जब विवश हुए छलसे कैसे वो प्रहार किया।

वध करना हीं था दु:शासन का भीम तो कर देता,
केश रक्त के प्यासे पांचाली चरणों में धर देता।
कृपाचार्य क्या बात हुई दु:शासन का रक्त पी पीकर,
पशुवत कृत्य रचाकर निजको कैसे कहता है वो नर।

और पढ़े
Ajay Amitabh Suman verified कोट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी कविता
2 महीना पहले
Ajay Amitabh Suman verified कोट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी कविता
2 महीना पहले
Ajay Amitabh Suman verified कोट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी कविता
2 महीना पहले
Ajay Amitabh Suman verified कोट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी कविता
2 महीना पहले
Ajay Amitabh Suman verified कोट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी कविता
2 महीना पहले
Ajay Amitabh Suman verified कोट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी कविता
2 महीना पहले

जिस प्रकार अंगद ने रावण के पास जाकर अपने स्वामी मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम चन्द्र के संधि का प्रस्ताव प्रस्तुत किया था , ठीक वैसे हीं भगवान श्रीकृष्ण भी महाभारत युद्ध शुरू होने से पहले कौरव कुमार दुर्योधन के पास पांडवों की तरफ से  शांति प्रस्ताव लेकर गए थे। एक दूत के रूप में अंगद और श्रीकृष्ण की भूमिका एक सी हीं प्रतीत होती है । परन्तु वस्तुत:  श्रीकृष्ण और अंगद के व्यक्तित्व में जमीन और आसमान का फर्क है । श्रीराम और अंगद के बीच तो अधिपति और प्रतिनिधि का सम्बन्ध था ।  अंगद तो मर्यादा पुरुषोत्तम  श्रीराम के संदेशवाहक मात्र थे  । परन्तु महाभारत के परिप्रेक्ष्य में श्रीकृष्ण पांडवों के सखा , गुरु , स्वामी ,  पथ प्रदर्शक आदि सबकुछ  थे । किस तरह का व्यक्तित्व दुर्योधन को समझाने हेतु प्रस्तुत हुआ था , इसके लिए कृष्ण के चरित्र और  लीलाओं का वर्णन समीचीन होगा ।  कविता के इस भाग में कृष्ण का अवतरण और बाल सुलभ लीलाओं का वर्णन किया गया है ।  प्रस्तुत है दीर्घ कविता  "दुर्योधन कब मिट पाया" का चतुर्थ  भाग। #Poetry #Hindi_Kavita #Duryodhana #Mahabharata #Krishna #Ravana #Govardhan #Kanha #Shyam #Angad   #कविता #दुर्योधन #महाभारत #धर्मयुद्ध #श्रीकृष्ण #कान्हा #गोपी #गोवर्धन #अंगद

और पढ़े